आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P28-0063 · भाग 28

गुरु जी, आपने कहा सामर्थ्यवान बनो, लेकिन भगवान राम ने तो भरत भाई के लिए सब कुछ छोड़ दिया था?

यही तो बात है — वो सामर्थ्यवान थे। और उन्होंने क्या छोड़ा? राजगद्दी तो उन्हें प्राप्त हुई ही नहीं थी, वो तो भरत को मिली; उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिला और वो जंगल गए। तो छोड़ने की बात ही यहां नहीं आती। राजगद्दी मिल रही थी तो उसका भी विरोध नहीं किया, स्वीकार किया; और जब वनवास मिला तो वनवास भी स्वीकार किया। सब बोलते हैं सब छोड़-छाड़ के जंगल गए — कुछ नहीं छोड़ा; जो मिला वो स्वीकार किया और उसमें काम किया। इसीलिए वो श्रेष्ठ हैं, क्योंकि उन्होंने विरोध नहीं किया। वहां भी गए तो अपना काम किया, राक्षसों का संहार किया — सामर्थ्यवान थे तभी तो काम किया। सामर्थ्यवान नहीं हो तो जहां जाओगे भटकोगे, लोगों को तकलीफ दोगे। इसलिए सामर्थ्यवान रहो — धन से, तन से और अपनी समझ से — तब जहां भी जाओगे, उस जगह का उपयोग भी करोगे और उस जगह के लिए, लोगों के लिए कुछ कर भी पाओगे। इसीलिए कहा गया है, जीवंत गुरु की शरण में जाकर शास्त्रों का अध्ययन करो; वो आपकी धारणा को तोड़ेगा और आपको प्रत्यक्ष अनुभव कराएगा।

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