प्रश्नोत्तर P28-0073 · भाग 28
गुरु जी, जो परंपराएं बनी हैं वो समाज के द्वारा बनी हैं या किसी ज्ञानी पुरुष या महात्मा ने बनाईं?
शुरुआत में तो कोई योग्य ही बनाता है; परंपरा ऐसे ही नहीं बन जाती, कोई साधारण आदमी परंपरा नहीं बना सकता — परंपरा बनाने वाला हमेशा श्रेष्ठ होता है। फिर लोगों ने उसमें मिलावट कर दी। लोग बोलते हैं बुद्ध ने, कबीर ने मूर्ति पूजा का विरोध किया — उन्होंने कभी विरोध नहीं किया; कबीर का गुरु तो खुद मूर्ति पूजक था, और बोधगया चले जाओ, बुद्ध की मूर्ति ही तो रखी है। एक तरफ मूर्ति का विरोध कर रहे हैं और एक तरफ उन्हीं की मूर्ति बना रहे हैं — बनानी ही पड़ेगी, क्योंकि मूर्ति के पीछे एक चरित्र है; मूर्ति इसलिए रखी गई कि आपको चरित्र याद रहे। उस मूर्ति को प्रणाम करके मुझे वो चरित्र अपनाना है; लेकिन तुम चरित्र नहीं अपनाते, मूर्ति धोते रहते हो। कबीर ने संदेश दिया समभाव, समदृष्टि; बुद्ध ने प्रेम, दया, करुणा; महावीर ने अहिंसा परमो धर्म; कृष्ण भगवान ने कहा कर्म ही पूजा है — कौन सा कर्म? निष्काम कर्म। तुमने पकड़ लिया बच्चे पैदा करना, परिवार की सेवा करना — ये तो जानवर भी करते हैं। राम ने कहा बुराई का नाश करो, अच्छाई में जियो। लोग उनके गुण छोड़कर सिर्फ रूप की पूजा करते रहे, और राग-द्वेष में फंस गए।
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