प्रश्नोत्तर P28-0072 · भाग 28
गुरु जी, परंपरा निभाई जाए या खोज की जाए?
किसी ने शुरुआत में परंपरा बनाई थी आवरण से मुक्त होने के लिए, पर आज परंपरा बंधन हो गई है — वो एक परंपरा का आवरण है और उस आवरण को लोगों ने पकड़ लिया। हमें धारणाओं से मुक्त होना था, अब हमने धारणाएं बना लीं, एक समूह बना लिया, उसमें उठने-बैठने लगे। तो हमें परंपराओं को भी छोड़ना पड़ेगा, तभी हम आगे बढ़ पाएंगे। परंपराएं हमारे लिए सहायक हैं, जैसे किताब पढ़ने तक के लिए क, ख, अ, आ सहायक हैं — लेकिन जिंदगी भर यही मत पढ़ते रहो, नहीं तो जिंदगी भर क, ख में ही खत्म हो जाओगे। जीवन में हम कहां फंसे हैं, यह समझने के लिए हमने शब्दों का सहारा लिया और शब्द में ही फंस गए। हमें शब्दों के द्वारा मुक्ति तक जाना था। तो मुझे यह देखना-समझना पड़ेगा कि मेरा उद्धार कैसे होगा।
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