प्रश्नोत्तर P28-0194 · भाग 28
प्रभु जी, संन्यास जीवन और गृहस्थ जीवन में कौन सबसे ज्यादा कठिन है?
देखिए, दोनों में बेईमानी छोड़नी पड़ती है। संन्यास का मतलब होता है अपने विकारों का नाश कर दे। संन्यासी का भाव यह होता है कि मुझे समाज में दुख दिखा और मैं घरबार छोड़ के समाज हित के लिए निकल रहा हूं, इसलिए मुझे ज्ञान चाहिए। वो समाज से उतनी ही व्यवस्था लेता है जितने में वो जी सके, संचय नहीं करता, और फिर उसकी भरपाई ज्ञान देकर करता है — जब आत्मज्ञान उपलब्ध होता है तो समाज को ज्ञान देता है। गृहस्थ का भाव यह कि मैं ईमानदारी से जीवन जीते हुए, आंतरिक ईमानदारी, मेहनत और मेरे कर्म से किसी को तकलीफ ना हो, मेरे दरवाजे से कोई भूखा-प्यासा ना जाए, और परोपकार करते हुए मुक्ति से मोक्ष तक पहुंच सकता है। लेकिन ध्यान देना — चाहे संन्यासी हो चाहे गृहस्थ, उसे छोड़ना तो बेईमानी ही पड़ता है। बेईमानी धारण करके हम भटक गए, बेईमानी छोड़ के हम पहुंच जाएंगे।
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वीडियो: गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु का क्या कर्तव्य है शिष्य के प्रति / #योगीजी_का_सत्संग #गुरु #पूर्णिमा · 2024-07-21