आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P29-0076 · भाग 29

गुरु जी, आज गुरु पूर्णिमा का बहुत बड़ा दिन है — आज कोई ऐसी घटना बताइए जो आपको ईश्वर के बहुत नजदीक लेकर गई हो।

लगभग 2011 की बात है। मैं कई महीनों से फलाहारी पर रहता था; मुंबई में विरार में रूम लेकर साधना कर रहा था। एक दिन ऐसी परिस्थिति आ गई कि मेरे पास पैसे नहीं; रूम में चावल, नमक, हीटर — सब व्यवस्थाएं हैं, लेकिन जो मैं खाता हूं वह नहीं है। दवा लेने के लिए पैसे नहीं थे; पानी में शक्कर मिलाकर पिया, शक्कर भी खत्म हो गई। एक रात लगा कि आज मैं खत्म हो जाऊंगा। मेरे इष्ट थे — माता काली और काल भैरव की प्रतिमा थी — मैंने कहा, खत्म तो हो जाऊंगा, लेकिन यह मत सोचना कि मैं यह सब बना के खाने वाला हूं। तुझे मुझ पर शक है, ठीक है; मुझे अपने आप पर शक नहीं है, क्योंकि मैं तेरे सहारे निकला हूं — जितनी परीक्षा लेनी है ले ले। उस रात मैंने पूरी तरह मृत्यु को स्वीकार किया और देखा कि मृत्यु कैसी होती है — एक तरफ जीवन था, एक तरफ मृत्यु; मुझे लगा अगर यह करूंगा तो मेरी साधना अपूर्ण रह जाएगी, यह मेरी परीक्षा है। मैंने मृत्यु को चुना, जीवन को छोड़ा। फिर सुबह हुई, मैं मिला अपने आप से; जहां से पैसे आने थे उनसे बात हुई, जीवन चलने लगा। परीक्षा बड़ी कठिन होती है, पास करने के बाद बड़ा अद्भुत लगता है। इसलिए पक्का कर लो सच में आपको क्या चाहिए। किसी भी साधक को आत्मज्ञान तक पहुंचने में मृत्यु को तो स्वीकार करना ही पड़ता है — जैसे मां बनने वाली को उस पीड़ा से गुजरना ही पड़ता है। आत्मज्ञान उसी को होता है जिसके सारी जिंदगी के ऑप्शन खत्म हो जाते हैं। मृत्यु जब खड़ी होती है, रोम-रोम से आंसू आते हैं।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु का क्या कर्तव्य है शिष्य के प्रति / #योगीजी_का_सत्संग #गुरु #पूर्णिमा · 2024-07-21