आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर — भाग 29

योगी रविकांत जी (योगी गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 38 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

गुरु जी, साधना से आपने क्या पाया?

ना पाया और ना खोया। इतना समझ में आ गया कि यहां ना कुछ पाने के लिए है, ना कुछ खोने के लिए। इतनी बात समझ में आ गई।

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बाबा जी, क्या हम यहां बैठे-बैठे, बिना फोन के, दूर किसी व्यक्ति से बात कर सकते हैं?

फोन लगा के बात कर लो। टेलीपैथी की क्या जरूरत है? फोन से बात कर लो — इस समय इतने सस्ते हैं, फ्री भी है, दिन भर बात करो। जो काम मोबाइल कर सकता है, उसके लिए क्या जरूरत है? और पास वाले से कर लो ना, वही सामने है। उनसे थक गए हो क्या, जो दूर वालों से कर रहे हो?

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गुरु जी, नास्तिक को भगवान कैसे मिलेगा?

अब ये नास्तिक जाने, भगवान जाने। आप अपना देख लो।

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गुरु जी, धारणा को जरा विस्तार से समझाइए।

धारणा मतलब आपको क्या चाहिए, ये पक्का करो। जैसे ही पक्का करते हो, धारणा बनने लगती है। जैसे मान लीजिए आपने पक्का किया कि मुझे ये मोबाइल या कार खरीदनी है — धारणा बना ली। अब वो धारणा आपसे पैसा कमवाएगी; बार-बार उसी पे इंगित करते रहेंगे, आपकी मेहनत बढ़ जाएगी और आप ले लोगे। और अगर आपने धारणा बनाई कि मुझे ये चाहिए और आप योग्य हो, तो तुरंत मिल जाएगा। तो धारणा बना लो कि मुझे क्या चाहिए; उसके बाद काम अपने आप ही होने लगेगा।

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महाराज जी, परिणाम को लेकर संशय है — कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि तू सिर्फ युद्ध कर, परिणाम की चिंता मत कर। कृपया प्रकाश डालिए।

इतना ही थोड़ी ना कहा था। इसके बाद ज्ञान भी करवाया, दिव्य दृष्टि दी, विराट रूप दिखाया — बहुत सारी घटनाएं हुईं।

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गुरु जी, तृष्णा से मुक्त जीवन के लिए क्या करें?

तृष्णा मतलब प्यास। जैसे रेत में गर्मी से भाप निकलती है, तो हिरण को लगता है पानी की लहर है, पीने के लिए भागता है, लेकिन वहां कुछ नहीं मिलता और प्यास बढ़ जाती है — वही मृग तृष्णा है। इससे छूटने का एक ही उपाय है: "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ।

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गुरु जी, कौन सौभाग्यशाली है और कौन दुर्भाग्यशाली?

मैं दुनिया का सौभाग्यशाली व्यक्ति उसे समझता हूं जो अध्यात्म को समझते हैं। और दुनिया का दुर्भाग्यशाली व्यक्ति वह है जो समझने के बाद भी अपना आत्मिक कल्याण नहीं करते। अब आप देख लो, दो में से किस में हो। और दोनों में से एक भी नहीं हो तो कोई बात नहीं — अभी प्रकृति ने अध्यात्म समझने की समझ नहीं दी है; जहां हो ठीक हो, समय आएगा, समझ बढ़ेगी, तो आना आपको यहीं पड़ेगा।

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गुरु जी, गृहस्थ जीवन में किस ब्रह्म की प्राप्ति हो सकती है?

ब्रह्म आपको प्राप्त कर लेगा। ब्रह्म आप प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि आप छोटे हो, वो बड़ा है, और छोटे पात्र में बड़ा पात्र कभी नहीं आता — छोटे पात्र को बड़े पात्र में जाना पड़ता है। इसलिए ईमानदारी, सत्कर्म जीवन में अपना लो। जब समय आएगा, जिस दिन आप पवित्र हो जाएंगे, वो आपको प्राप्त कर लेगा।

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गुरु जी, आप कहते हैं मन शरीर के लिए एरो का काम करता है, लेकिन और महात्मा कहते हैं कि जिसने मन को मार डाला उसे ही सूरमा कहते हैं — क्या समझें?

देखिए, आपके पास दो ऑप्शन हैं — एक उनका, एक मेरा। जिसका समझ में आए, उठा के अपना आत्मिक कल्याण करो।

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महाराज जी, आपके जीवन में किन-किन महापुरुषों का प्रभाव रहा?

मैं किसी का भी नाम नहीं ले सकता, क्योंकि मिले तीन लोग, लेकिन तीनों का मुझे नाम नहीं पता। एक मिले चित्रकूट में — उन्होंने घंटों बात की और बस इतनी बात समझ में आई कि जल्दबाजी मत करो; बड़ी जल्दबाजी थी मुझे। एक मिले बद्रीनाथ में — वो बोले आप बहुत अच्छे महात्मा हो। और एक मिले नर्मदा तट पर — वो मुझे नर्मदा तट पर लाए और आज तक मैं नर्मदा तट पर ही पड़ा हूं; मैं आया नहीं, लाया गया हूं। आखिरी वाले बोले कि पूरे भारत में आपको आत्मज्ञान कोई नहीं दे सकता; मैंने कहा मुझे आत्मज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए। तीनों को छोड़ के हम ही गए। तीनों अद्भुत ही थे।

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गुरु जी, मैं 27 साल का बेरोजगार हूं, बहुत परेशान हूं। जीवन का उद्देश्य क्या है, जीवन में क्या करूं? मार्गदर्शन कीजिए।

आपको क्या चाहिए, देख लीजिए। पक्का करो क्या चाहिए — फिर होने लगेगा, फिर आप करने लगोगे।

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गुरु जी, संसार के किसी व्यक्ति विशेष से जुड़ी आसक्ति को ईश्वर की ओर कैसे मोड़ सकते हैं?

बस उसे देख पाओ तो देख लो कि उसमें है क्या।

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गुरु जी, अध्यात्म मार्ग को प्रारंभ कहां से करूं?

ईमानदारी और सत्कर्म अपनाकर।

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गुरु जी, आपको आत्मज्ञान किस तरह, किस ध्यान विधि से हुआ?

कुछ बोल नहीं सकते। प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। कुछ बोल नहीं सकते कैसे हुआ — करके थक गए थे, पूछ-पूछ के थक गए।

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गुरुदेव, मैं अध्यापक हूं। साथी अध्यापक सांसारिकता में पूरे डूबे हुए हैं — उनको भी इस मार्ग पर लाने की इच्छा होती है। क्या प्रयास करूं या उन्हें उनकी नीति पर छोड़ दूं?

आप शिक्षक हैं तो विषय पढ़ाते हुए विद्यार्थियों को जीवन कैसे जिएं, लेनदेन कैसे करें, समाज में मानव की तरह कैसे जिएं — इसकी प्रेरणा दे सकते हैं, लेकिन ये नहीं कह सकते कि ये करो। आप खुद वो करते हुए अपनी सैलरी का कुछ उपयोग जरूरतमंद की सेवा में करिए — ठंड में कंबल-स्वेटर बांटो, भोजन बांटो, रविवार को सेवा करो; जितनी आपकी क्षमता है उतना, अधिकार से ज्यादा नहीं। साथी अध्यापकों के लिए आप अपनी तरफ से प्रयास करेंगे तो राग-द्वेष हो जाएगा। हो सके तो सत्संग का वीडियो दे सकते हैं; उनके अहंकार को जरा उठाइए — कहिए, "यार, मैं बहुत समय से सुन रहा हूं, समझ में नहीं आ रहा, आप जरा सुन के बताओ ये कहना क्या चाहते हैं।" तब वो बड़े ध्यान से सुनेगा, क्योंकि उसे बताना है।

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गुरु जी, जब प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है, तो कृष्ण जी ने यह क्यों कहा कि जो हमारी शरण में आता है उसे मैं माफ कर देता हूं?

शरण तक वही पहुंचता है जो प्रारब्ध भोग लेता है। यही तो बात है — बिना भोगे पहुंच ही नहीं पाएगा। युधिष्ठिर तो उनके साथ थे, बहुत लोग उनके साथ थे — क्यों नहीं बचा लिए? शरणागत का मतलब ऐसा नहीं है। उनकी शरण, जहां राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, मेरा और कर्ता का भाव ना हो — यह नहीं है, तब आप शरणागत होगे। यह है शरणागत का मतलब।

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गुरु जी, स्वयं को जानने के लिए माला करें या ध्यान करें, या दोनों एक साथ करें?

ईमानदारी, सत्कर्म करो।

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महाराज जी, मैं एक व्यापार शुरू करना चाहता हूं, लेकिन नहीं जानता कि चलेगा या नहीं। तो क्या व्यापार ना करूं?

ये आपको देखना है। कोई भी काम करिए तो पहले जानकारी ले लीजिए — उस फील्ड की पूरी नॉलेज होनी चाहिए कि इसका परिणाम क्या आएगा। तब आगे बढ़ेंगे तो ठीक है। और नहीं तो, पैसे अगर ज्यादा हैं तो रिस्क ले लो — क्या जाएगा? एक अनुभव तो मिलेगा। कमाने का नहीं मिलेगा तो बर्बाद होने का तो मिलेगा; उस बर्बादी में भी अनुभव है।

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गुरु जी, हंसता हुआ जीवन कैसे प्राप्त हो?

बस "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ, ऐसे ही हंसते रहोगे। गुदगुदी की क्या जरूरत है?

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गुरु जी, अर्जुन ने कृष्ण को गुरु बनाया — क्या हम कृष्ण को इष्ट बना सकते हैं?

ये आपके ऊपर है। मीरा ने इष्ट ही बनाया। इष्ट बनाया और उनकी कृपा से फिर उन्हें संत रविदास जी मिले; उन्होंने उन्हें गुरु बनाया और संत रविदास जी ने ज्ञान दिया।

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महाराज जी, क्या अनहद नाद ही परमात्मा है, जो हर जगह है, जो साकार, निराकार और शून्य भी है?

इसके बारे में हम कुछ भी नहीं बोल सकते। मुझे पता नहीं है, और मैं पता भी नहीं करना चाहता।

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योगी जी, ज्ञान से प्रभावित होता हूं लेकिन प्रकाशित नहीं होता।

ठीक है, उसमें जियो, और "मैं" क्या है देखिए। सीधा आपको ज्ञान दे रहा हूं, तो ज्ञान लीजिए — सीधा-सीधा।

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गुरु जी, सब काम में ऐसे फंस जाते हैं कि ज्ञान याद ही नहीं रहता; फिर अकेले होते हैं तो याद आता है।

कोई बात नहीं। सुनते रहो, समझते रहो — व्यवहारिक जगत में उतरने लगेगा।

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गुरु जी, आप कहते हैं करने से ही तो छूटना है — तो क्या करने से छूटना है? क्योंकि कर्मों को करने से तो बचा नहीं जा सकता।

कर्म और कार्य में कुछ अंतर है। कर्म करते हुए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धोखा, पाखंड — ये करना बंद कर दो। बात खत्म।

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गुरु जी, क्या सब कुछ एक है? सब कुछ एक से है?

यह सामने क्या है? बरगद का पेड़ बोला आपने — लेकिन सामने तो पत्ते दिख रहे हैं; पत्ते दिख रहे तो पेड़ क्यों बोला? हम वर्तमान में जीते ही नहीं, आगे का छोड़ के पीछे भागते हैं। पत्ते अनेक हैं, अलग-अलग दिखाई देते हैं, अलग-अलग ही बोले जाएंगे, लेकिन पेड़ एक ही है — पत्ते एक नहीं, एक जैसे हैं; तत्व एक जैसा है, रूप में अलग-अलग हैं। वैसे ही आत्मा — एक जैसा आत्मा है, बाहर से शरीर मिल गया है, इसकी वजह से हम अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन तत्व एक ही है।

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गुरु जी, क्या आत्मज्ञान में तीर्थों का कुछ उपयोग है?

नहीं। जाने से, भ्रमण करने से आपको पता चलता है कि लोग कैसे जीते हैं, और मैं कैसा हूं। बातचीत करने से बहुत सारी बातें क्लियर होती हैं — बस इतना।

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गुरुदेव, भक्ति मार्ग में गुरु शरण में निर्गुणी भजन-कीर्तन आत्मज्ञान की यात्रा में कितना सहायक हो सकता है?

आप किसके लिए गाते हैं — अपने लिए गाते हैं या उस भीड़ के लिए गाते हैं? ये देखो। अपने लिए गाते हैं तो सहायक है, और समाज के लिए गाते हैं तो मान-सम्मान मिलेगा। बस।

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गुरु जी, क्या प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों को ही भुगतता है? जिस लड़की के साथ बलात्कार हुआ, क्या उसका कोई पूर्व जन्म का कर्म था जो फलीभूत हुआ? यह प्रश्न दिनोंदिन परेशान कर रहा है।

इसमें कुछ बोला नहीं जा सकता। एक व्यक्ति बेईमानी भोग रहा है तो एक खत्म हो रहा है, और जो बेईमानी कर रहा है उसका नया बन रहा है। हो सकता है वो लड़की जिम्मेदार ही नहीं हो, और ये करने वाला गलत हो, उसके लिए नया हो। लेकिन वर्तमान की बात करें तो हमारे सामने गलत वह है, और उसे दंड मिलना चाहिए। बात खत्म। पीछे से क्या मतलब है? किसी ने झापड़ मारा तो ये थोड़ी ना कहेंगे कि पिछले जन्म में तुमने मारा था — तुम तलवार निकालोगे तो हम भी अपनी सामर्थ्य दिखाएंगे।

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सर, ध्यान में विचार बंद होने के बाद जब उसी में रहते हैं तो उसके ऊपर जाते हैं और हल्के होते हैं — उस खिंचाव के ऊपर क्या है?

बस देखते रहो, आगे बढ़ते रहो।

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गुरु जी, वर्तमान के पल में कैसे जिएं?

बस अपने तरीके से "चाहिए" का त्याग कर दो, वर्तमान हो जाएगा।

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गुरु जी, क्या मनुष्य जीवन में राग-द्वेष से पूर्ण मुक्ति संभव है?

एकदम पक्का, इसी जीवन में। मैं तो इतना जानता हूं।

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गुरु जी, विशुद्ध जीवन क्या है? और क्या यही दशा उत्तम है, या इससे आगे भी कुछ रह जाता है?

अशुद्धि से अपने आप को मुक्त करा लो। अशुद्धि खत्म, शुद्धता में आ गए। हम बहुत सरल शब्दों में जवाब देते हैं; आप लोग बहुत कठिन-कठिन शब्द इकट्ठा कर लेते हो। मैं एकदम सरल शब्दों में ज्ञान दे रहा हूं।

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गुरु जी, क्या गृहस्थ (हैप्पी फैमिली वाले) साधु जीवन जी सकते हैं?

साधु का मतलब होता है — धूल; जिसने साधना करके अपनी धूल को मिटा दिया, वह साधु है। यही साधु की परिभाषा है।

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गुरु जी, क्या लोक कल्याण की कामना या भावना राग-द्वेष का रूप नहीं है?

नहीं। अगर लोक कल्याण में आपको सच में कुछ नहीं चाहिए, पूरा आंतरिक भाव है, तब राग-द्वेष नहीं हो सकता। और अगर उस लोक कल्याण के पीछे आपको कुछ चाहिए, तब राग-द्वेष हो जाएगा — मिलेगा तो राग, नहीं मिलेगा तो द्वेष। करने वाले को पता है; शुरुआत में उसे पता रहता है, और बाद में उसका काम बताने लगता है।

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गुरु जी, लोक कल्याण में अपने आप को मिटा दो — क्या यही साधना है?

हां, यही साधना है। और ऐसे लोगों को कौन ढूंढता है, पता है? परमात्मा। लेकिन लोक कल्याण का पूरा आंतरिक भाव हो — उसमें सच में कुछ नहीं चाहिए; मिटा दे अपने आप को।

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गुरु जी, क्या शून्य ही लक्ष्य है?

नहीं। शून्य के पीछे जो है, वो होना चाहिए। शून्य भी तो हमसे अलग है।

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गुरु जी, आप अपना आसन, खटिया स्वयं उठाते हैं, बर्तन खुद मांजते हैं — साधकों से सेवा क्यों नहीं लेते?

अगर हम अपाहिज नहीं हैं और अपनी ही सेवा नहीं करेंगे तो कौन करेगा? कोई अपाहिज सेवा ले तो ठीक लगता है; जो सब कुछ शरीर सही होने के बाद दूसरों से सेवा ले रहा है, वो समाज के लिए क्या काम करेगा? वो अपाहिज ना होते हुए भी अपाहिज वाली जिंदगी जी रहा है। हम सेवा करने निकले हैं, करवाने नहीं। मैं जब निकला तो मेरा यही भाव था कि समाज के लिए मुझे कुछ करना है — करना है, करवाना नहीं। इसीलिए अपना आसन खुद उठाता हूं, बर्तन खुद मांजता हूं, भोजन भी बना लेता हूं। मैं तो सेवा करते-करते जाना चाहता हूं, सेवा लेते-लेते नहीं।

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गुरु जी, परमात्मा स्वयं साधक से बात करते हैं, या फिर देवगण जवाब देते हैं?

उस स्थिति पर पहुंचो, पता चल जाएगा। परमात्मा को क्या जरूरत है साधक से बात करे?

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