फोन लगा के बात कर लो। टेलीपैथी की क्या जरूरत है? फोन से बात कर लो — इस समय इतने सस्ते हैं, फ्री भी है, दिन भर बात करो। जो काम मोबाइल कर सकता है, उसके लिए क्या जरूरत है? और पास वाले से कर लो ना, वही सामने है। उनसे थक गए हो क्या, जो दूर वालों से कर रहे हो?
धारणा मतलब आपको क्या चाहिए, ये पक्का करो। जैसे ही पक्का करते हो, धारणा बनने लगती है। जैसे मान लीजिए आपने पक्का किया कि मुझे ये मोबाइल या कार खरीदनी है — धारणा बना ली। अब वो धारणा आपसे पैसा कमवाएगी; बार-बार उसी पे इंगित करते रहेंगे, आपकी मेहनत बढ़ जाएगी और आप ले लोगे। और अगर आपने धारणा बनाई कि मुझे ये चाहिए और आप योग्य हो, तो तुरंत मिल जाएगा। तो धारणा बना लो कि मुझे क्या चाहिए; उसके बाद काम अपने आप ही होने लगेगा।
तृष्णा मतलब प्यास। जैसे रेत में गर्मी से भाप निकलती है, तो हिरण को लगता है पानी की लहर है, पीने के लिए भागता है, लेकिन वहां कुछ नहीं मिलता और प्यास बढ़ जाती है — वही मृग तृष्णा है। इससे छूटने का एक ही उपाय है: "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ।
मैं दुनिया का सौभाग्यशाली व्यक्ति उसे समझता हूं जो अध्यात्म को समझते हैं। और दुनिया का दुर्भाग्यशाली व्यक्ति वह है जो समझने के बाद भी अपना आत्मिक कल्याण नहीं करते। अब आप देख लो, दो में से किस में हो। और दोनों में से एक भी नहीं हो तो कोई बात नहीं — अभी प्रकृति ने अध्यात्म समझने की समझ नहीं दी है; जहां हो ठीक हो, समय आएगा, समझ बढ़ेगी, तो आना आपको यहीं पड़ेगा।
ब्रह्म आपको प्राप्त कर लेगा। ब्रह्म आप प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि आप छोटे हो, वो बड़ा है, और छोटे पात्र में बड़ा पात्र कभी नहीं आता — छोटे पात्र को बड़े पात्र में जाना पड़ता है। इसलिए ईमानदारी, सत्कर्म जीवन में अपना लो। जब समय आएगा, जिस दिन आप पवित्र हो जाएंगे, वो आपको प्राप्त कर लेगा।
मैं किसी का भी नाम नहीं ले सकता, क्योंकि मिले तीन लोग, लेकिन तीनों का मुझे नाम नहीं पता। एक मिले चित्रकूट में — उन्होंने घंटों बात की और बस इतनी बात समझ में आई कि जल्दबाजी मत करो; बड़ी जल्दबाजी थी मुझे। एक मिले बद्रीनाथ में — वो बोले आप बहुत अच्छे महात्मा हो। और एक मिले नर्मदा तट पर — वो मुझे नर्मदा तट पर लाए और आज तक मैं नर्मदा तट पर ही पड़ा हूं; मैं आया नहीं, लाया गया हूं। आखिरी वाले बोले कि पूरे भारत में आपको आत्मज्ञान कोई नहीं दे सकता; मैंने कहा मुझे आत्मज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए। तीनों को छोड़ के हम ही गए। तीनों अद्भुत ही थे।
आप शिक्षक हैं तो विषय पढ़ाते हुए विद्यार्थियों को जीवन कैसे जिएं, लेनदेन कैसे करें, समाज में मानव की तरह कैसे जिएं — इसकी प्रेरणा दे सकते हैं, लेकिन ये नहीं कह सकते कि ये करो। आप खुद वो करते हुए अपनी सैलरी का कुछ उपयोग जरूरतमंद की सेवा में करिए — ठंड में कंबल-स्वेटर बांटो, भोजन बांटो, रविवार को सेवा करो; जितनी आपकी क्षमता है उतना, अधिकार से ज्यादा नहीं। साथी अध्यापकों के लिए आप अपनी तरफ से प्रयास करेंगे तो राग-द्वेष हो जाएगा। हो सके तो सत्संग का वीडियो दे सकते हैं; उनके अहंकार को जरा उठाइए — कहिए, "यार, मैं बहुत समय से सुन रहा हूं, समझ में नहीं आ रहा, आप जरा सुन के बताओ ये कहना क्या चाहते हैं।" तब वो बड़े ध्यान से सुनेगा, क्योंकि उसे बताना है।
शरण तक वही पहुंचता है जो प्रारब्ध भोग लेता है। यही तो बात है — बिना भोगे पहुंच ही नहीं पाएगा। युधिष्ठिर तो उनके साथ थे, बहुत लोग उनके साथ थे — क्यों नहीं बचा लिए? शरणागत का मतलब ऐसा नहीं है। उनकी शरण, जहां राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, मेरा और कर्ता का भाव ना हो — यह नहीं है, तब आप शरणागत होगे। यह है शरणागत का मतलब।
ये आपको देखना है। कोई भी काम करिए तो पहले जानकारी ले लीजिए — उस फील्ड की पूरी नॉलेज होनी चाहिए कि इसका परिणाम क्या आएगा। तब आगे बढ़ेंगे तो ठीक है। और नहीं तो, पैसे अगर ज्यादा हैं तो रिस्क ले लो — क्या जाएगा? एक अनुभव तो मिलेगा। कमाने का नहीं मिलेगा तो बर्बाद होने का तो मिलेगा; उस बर्बादी में भी अनुभव है।
ये आपके ऊपर है। मीरा ने इष्ट ही बनाया। इष्ट बनाया और उनकी कृपा से फिर उन्हें संत रविदास जी मिले; उन्होंने उन्हें गुरु बनाया और संत रविदास जी ने ज्ञान दिया।
यह सामने क्या है? बरगद का पेड़ बोला आपने — लेकिन सामने तो पत्ते दिख रहे हैं; पत्ते दिख रहे तो पेड़ क्यों बोला? हम वर्तमान में जीते ही नहीं, आगे का छोड़ के पीछे भागते हैं। पत्ते अनेक हैं, अलग-अलग दिखाई देते हैं, अलग-अलग ही बोले जाएंगे, लेकिन पेड़ एक ही है — पत्ते एक नहीं, एक जैसे हैं; तत्व एक जैसा है, रूप में अलग-अलग हैं। वैसे ही आत्मा — एक जैसा आत्मा है, बाहर से शरीर मिल गया है, इसकी वजह से हम अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन तत्व एक ही है।
आप किसके लिए गाते हैं — अपने लिए गाते हैं या उस भीड़ के लिए गाते हैं? ये देखो। अपने लिए गाते हैं तो सहायक है, और समाज के लिए गाते हैं तो मान-सम्मान मिलेगा। बस।
इसमें कुछ बोला नहीं जा सकता। एक व्यक्ति बेईमानी भोग रहा है तो एक खत्म हो रहा है, और जो बेईमानी कर रहा है उसका नया बन रहा है। हो सकता है वो लड़की जिम्मेदार ही नहीं हो, और ये करने वाला गलत हो, उसके लिए नया हो। लेकिन वर्तमान की बात करें तो हमारे सामने गलत वह है, और उसे दंड मिलना चाहिए। बात खत्म। पीछे से क्या मतलब है? किसी ने झापड़ मारा तो ये थोड़ी ना कहेंगे कि पिछले जन्म में तुमने मारा था — तुम तलवार निकालोगे तो हम भी अपनी सामर्थ्य दिखाएंगे।
अशुद्धि से अपने आप को मुक्त करा लो। अशुद्धि खत्म, शुद्धता में आ गए। हम बहुत सरल शब्दों में जवाब देते हैं; आप लोग बहुत कठिन-कठिन शब्द इकट्ठा कर लेते हो। मैं एकदम सरल शब्दों में ज्ञान दे रहा हूं।
नहीं। अगर लोक कल्याण में आपको सच में कुछ नहीं चाहिए, पूरा आंतरिक भाव है, तब राग-द्वेष नहीं हो सकता। और अगर उस लोक कल्याण के पीछे आपको कुछ चाहिए, तब राग-द्वेष हो जाएगा — मिलेगा तो राग, नहीं मिलेगा तो द्वेष। करने वाले को पता है; शुरुआत में उसे पता रहता है, और बाद में उसका काम बताने लगता है।
हां, यही साधना है। और ऐसे लोगों को कौन ढूंढता है, पता है? परमात्मा। लेकिन लोक कल्याण का पूरा आंतरिक भाव हो — उसमें सच में कुछ नहीं चाहिए; मिटा दे अपने आप को।
अगर हम अपाहिज नहीं हैं और अपनी ही सेवा नहीं करेंगे तो कौन करेगा? कोई अपाहिज सेवा ले तो ठीक लगता है; जो सब कुछ शरीर सही होने के बाद दूसरों से सेवा ले रहा है, वो समाज के लिए क्या काम करेगा? वो अपाहिज ना होते हुए भी अपाहिज वाली जिंदगी जी रहा है। हम सेवा करने निकले हैं, करवाने नहीं। मैं जब निकला तो मेरा यही भाव था कि समाज के लिए मुझे कुछ करना है — करना है, करवाना नहीं। इसीलिए अपना आसन खुद उठाता हूं, बर्तन खुद मांजता हूं, भोजन भी बना लेता हूं। मैं तो सेवा करते-करते जाना चाहता हूं, सेवा लेते-लेते नहीं।