आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P29-0079 · भाग 29

गुरु जी, जब आप साधना के लिए निकले थे, तब मच्छर और कीड़े-मकोड़ों से डर नहीं लगता था? उस समय जंगल में साधना कैसे होती थी?

नहीं, कभी नहीं। मैं तो मच्छरदानी भी कभी नहीं लगाया; ऐसे नीचे भी सो जाता था। कभी-कभी तो ऐसे बैठ के कटवाते थे कि काट लो जितना काटना है। नर्मदा तट पे झाड़ियां थीं; मैं उठता था तो मेरे ऊपर से कोई जानवर कूद के चला जाता था, आसपास सांप वगैरह रहते थे। अपने अंदर डर नहीं होना चाहिए। साधना ऐसे होती थी कि नींद नहीं आती थी, तो चिंतन होता था — मच्छर नहीं काटेंगे तो अच्छी नींद आएगी; मच्छर काटेंगे तो करवट बदलोगे, नींद खुल जाती थी तो चिंतन अच्छा होता था। आप यह मत सोचो कि मुझे सोना पड़ेगा — शरीर अपनी नींद ले ही लेगा, शरीर अपनी जरूरत पूरी करेगा। रात को नींद खुल जाए तो एक घंटे चिंतन करो कि मैं कैसे अपने आप को इस दलदल से निकालूं, कैसे अपना कल्याण करूं, कैसे इस भवसागर से निकलूं — उसमें आंसू आने चाहिए। यह चिंतन होते रहना चाहिए।

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