प्रश्नोत्तर P29-0115 · भाग 29
गुरु जी, क्या इसके लिए गृहस्थ में रहकर भी प्रयास कर सकते हैं?
कहीं भी — देखिए मैं आपको एक बात बताता हूं, चाहे आप गृहस्थी हो चाहे आप संन्यासी हो। गृहस्थी मतलब जो अपने परिवार को लेकर अपना आत्मिक कल्याण करना चाहता है; और संन्यासी जगत कल्याण के लिए निकलता है। संन्यास दोनों को लेना पड़ता है — संन्यास का मतलब अपनी बुराइयों का नाश कर देना। आप चाहे गृहस्थी में रहो, चाहे आप संन्यासी हो जाओ, छोड़ना बेईमानी है। मैं भी कपड़े पहनता हूं, मैं भी खाता हूं, मैं भी पीता हूं; घर की जगह कुटिया नाम रख दिया गया, भोजन बनाने का तरीका सब वही है। छोड़ने के लिए इस दुनिया में बेईमानी के अलावा और कुछ बता दो — और कुछ भी नहीं है। ईमानदारी तो हमारा मूल स्वरूप है, वो तो है ही। चाहे आप हिमालय में चले जाओ, इस शरीर के लिए कहीं ना कहीं से भोजन लेना पड़ेगा; त्यागने के लिए बेईमानी के अलावा कुछ भी नहीं है, और यही त्याग सकते हैं। पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं, बस मानव ने एक नया काम किया है — बेईमानी, और उससे वो खुद परेशान हो गया।
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वीडियो: #अहंकार से कैसे मुक्त हों ?| How to Dissolve the #Ego: The Path to #Spiritual #Freedom · 2026-05-13