प्रश्नोत्तर P30-0133 · भाग 30
गुरु जी, मन में जो काम-भाव और गलत विचार उठते हैं, उन्हें खाली करना है। शरीर से मैं दूर हूं, फिर भी ये विचार सतत क्यों चल रहे हैं?
कहीं ना कहीं शरीर को आपने उस राह पे कभी ना कभी चलाया होगा, तभी वह आज परेशान कर रहा है; कहीं ना कहीं आपने कभी आदत डाली होगी। सतत तब तक चलेगा जब तक उसकी भरपाई नहीं होगी, क्योंकि हमने अतीत में ऐसा किया है। आज मेरे पास समझ आ गई, आज मैं नहीं कर रहा हूं — लेकिन जिन लोगों के साथ हमने किया है, उनकी मानसिकता मेरी तरफ बनी हुई है, वो तो घुटन में जी रहे हैं। विचार ऐसे नहीं आते; जितनी आपको जानकारी है, उतने विचार आएंगे। जैसे आपको पढ़ना आता है, तभी आप इस बैनर को पढ़कर वो विचार ग्रहण करोगे; नहीं तो बस कलर देखोगे, लिखा देखोगे। कभी ना कभी अतीत में आपने किया होगा — याद करो, ये आपको खुद पता है। आप देखिए कि आपसे गलती कहां हुई है; अगर गलती हुई है तो किसी से बोलने की भी जरूरत नहीं है — पश्चाताप करिए। और (विचार) आ रहा है, आने दीजिए, उसको पकड़िए मत। आपके द्वारा कर्म क्या हो रहा है, वो मायने रखता है। जब हम शरीर में कुछ आदत डाल देते हैं, तो वह विचार हमें घेरे रहते हैं — जैसे एक व्यक्ति नशा करता है, बाद में उसकी समझ आती है, नशा छोड़ता है, लेकिन नशा उसे घेरे रहता है, सताता रहता है; शरीर से वो नहीं करता, लेकिन मानसिक रूप से ग्रसित रहता है। तो कोई बात नहीं — विचार आ रहा है, आने दीजिए; आपके द्वारा क्या हो रहा है, वो (ठीक) करिए, इसे छोड़िए।
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