कई जन्म से हम घूम रहे हैं; हो सकता है हम पिछले जन्म में आए हो। साइंस की लैंग्वेज में इसे डेजा वू कहते हैं — ऐसा लगता है सेम ये परिस्थिति पहले भी हुई थी। तो ऐसा हो जाता है।
जब ऐसी घटनाएं आपके सामने हो जाएंगी तो आएगा ना। बात यहां लगाव की है — जिसका जितना लगाव, उस हिसाब से सुख-दुख होगा। सुख-दुख दोनों आपके लगाव की वजह से होते हैं। स्नेह, प्यार, मोह, जैसा जिसका उठना-बैठना, बोलना-चलना, उसी हिसाब से दुख और सुख होता है। ज्यादा करीबी रहा होगा तब आपको ज्यादा दुख हुआ। समझ के द्वारा निकल सकते हैं — जैसे-जैसे समझ बढ़ेगी। डिप्रेशन लगाव की वजह से, मोह की वजह से होता है। कोई बच्चा आईआईटी क्लियर नहीं कर पाया तो डिप्रेशन — उसके ऊपर ये सब थोपना नहीं चाहिए। मैं तो कह रहा हूं बच्चों को बोलो — जियो, जीने के लिए पढ़ो। आज लोग बच्चों को एटीएम मशीन बना रहे हैं — मेरा कार्ड यह है तो तुम्हारा गोल्ड होना चाहिए, मैंने फ्लैट बनाया तो तुम बंगला बनाओ। शिक्षा पैसा कमाने के लिए नहीं देना चाहिए; शिक्षा इसलिए कि आपको उचित तरीके से जिंदगी को जीना है, और शिक्षा के साथ संस्कार बहुत जरूरी है।
यहां पे हर बालक अपने-अपने तरीके का लेके आता है; पूर्व जन्म का कुछ उसके साथ — सब अपना संस्कार लेके आते हैं। अगला-पिछला बहुत सारे संस्कार हमारे अंदर पड़े हैं, वो समय-समय पर जागृत होते हैं। और प्रेम विवाह तो पहले से है, आज से नहीं है।
फर्क तो पड़ेगा ना; संस्कार में भी फर्क पड़ जाता है। जानवर भी देखो, अगर आप क्रॉस कराओ तो उसके बच्चे अलग तरीके के पैदा होते हैं, तो ऐसा मानव में भी होगा ना — सबका डीएनए अलग-अलग होता है। ज्यादा तो बाप का प्रभाव रहेगा। देसी कुत्ता, जर्मन कुत्ता — सब कुत्ते ही तो हैं; ऐसे ही अलग-अलग प्रदेश के लोग अलग-अलग नस्ल के हैं, वो शादी करेंगे तो उनके बच्चे कुछ अलग पैदा होंगे — कुछ नई क्वालिटी की पैदावार होगी। कर्म से शरीर मिलता है; शरीर भी उसे वैसा मिलेगा जैसे ट्रेन में आपने जितना पैसा दिया वैसा डब्बा, वैसी सीट मिलेगी — ट्रेन एक ही है, उसी में ₹600 की भी सीट है और 3000 की भी। जीव अपनी मर्जी से नहीं आता; सबका लेनदेन है, कर्म के हिसाब से — उनका कहीं ना कहीं कनेक्शन एकदम रहता है।
ध्यान से तो मुक्त होना है। ध्यान से काम करो, और इस ध्यान से हमें मुक्त होना है जो क्षणिक ध्यान घटित हो रहा है। अगर आप इससे अपने आप को छुड़ा लिए और आत्मज्ञान तक पहुंच गए तो परम ध्यान घटित होगा।
आप बस अपने प्रश्न रखिए, जो जवाब दे दे वो गुरु है। मानव गुरु जरूरी नहीं — पशु गुरु भी हो सकता है। दत्तात्रेय भगवान ने 24 गुरु माने, उसमें पशु-पक्षियों को भी उन्होंने गुरु माना। तो आप ज्ञान किससे सीख लेते हो, आपके ऊपर है। हमने कुत्ते से सीखा — गड़रियों के कुत्ते, उनको बुलाओ तो इस तरफ देखते ही नहीं; वो बस अपनी चाल में चलते हैं और अपने भेड़ की रखवाली करते हैं, और अगर आपने उनकी भेड़ को जरा सा छेड़ा तो आपको छोड़ेंगे नहीं। हमने कहा साधक को इस तरीके से रहना चाहिए — किसी को देख के दुम मत हिलाओ, आप जिसके लिए निकले वो काम करो। लेकिन हम आवरण को देख के दुम हिला देते हैं — साइकिल वाले को देखेंगे तो ऐसे कर देंगे, और कार वाले को देखेंगे तो 'आइए आइए'। दुम हिलाने वाले साधक नहीं होते; अगर आपने दुम हिला दी तो साधक नहीं है।
घर से निकलो तो यह होना चाहिए कि मैं कोई जिम्मेदारी नहीं छोड़ रहा हूं; मैं अपनी पूरी जिम्मेदारी को करके फिर आगे बढ़ रहा हूं — तब छोड़ो, नहीं तो मत छोड़ना। एक बात और — आत्मिक कल्याण के लिए छोड़ना, और जब छोड़ना तो आत्मिक कल्याण के अलावा कोई बात ना करना; तब छोड़ना, नहीं तो जहां हो वहीं ठीक हो। ये मैं अनुभव से बोल रहा हूं। चाहे फिर आगे मौत आए या कुछ भी आए, बस एक ही काम करना है — आत्मिक कल्याण के अलावा कोई काम नहीं। माता-पिता की सेवा की चिंता हो तो ऐसा भी कर सकते हो कि आना-जाना रखो; ऐसा नहीं कि छोड़े तो छोड़ ही दिए, घर गए ही नहीं।
अंतःकरण का मतलब — आप कारण में जी रहे हैं, तो कारण से जो आप इकट्ठा कर रहे हैं वह अंतःकरण में जा रहा है। जब आप कारण में जी रहे हैं तो कारण शरीर है; उस कारण शरीर के अंदर अंतःकरण बना है, उसमें सब आप भर रहे हैं — कब तक? जब तक आप कारण में जिएंगे। कारण से हट जाएंगे तो कारण शरीर भी हट जाएगा, अंतःकरण भी सब खत्म हो जाएगा। इसका कार्य क्या है? कारण में जी रहे हो, कामनाओं की पूर्ति कर रहे हो। इच्छा-अपेक्षा से कारण शरीर तैयार हुआ, और जैसे ही आप इच्छा-अपेक्षा में गए, कारण शरीर बन गया; उस कारण शरीर में आप जो भी कर रहे हैं वो जमा हो रहा है — उसे अंतःकरण कहते हैं। अंतरात्मा अलग है, वो सबसे पीछे है। अब उस शरीर का नाश कैसे होगा? जब आप इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो जाएंगे तो वो शरीर तुरंत खत्म हो जाएगा, और अंतःकरण में जितना है सब खत्म हो जाएगा। इच्छा क्या है? योग्यता से ज्यादा चाहिए — ये इच्छा है। अपेक्षा क्या है? मैंने किसी के लिए किया तो उम्मीद बना के रखी कि मेरे लिए भी यह करेगा। यही सुख भी देता है, यही दुख भी देता है। बाकी अंतःकरण के बारे में सोचो ही मत, आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है; बस आप इच्छा और अपेक्षा से अपने आप को मुक्त करा लो, सब अपने आप खत्म हो जाएगा।
जैसे ही एक तरफ इच्छा-अपेक्षा का भाव बन रहा है, जीव पैदा हो गया। जीव इच्छा-अपेक्षा से आत्मा से बन रहा है; मूल तो आत्मा है, पीछे तो आत्मा है। पानी ही बर्फ बन रहा है, बर्फ ही आइसक्रीम बन रहा है, लेकिन पीछे मूल पानी है — स्वाद के चक्कर में बर्फ आइसक्रीम बन गया, स्वाद के चक्कर में तुमने कारण शरीर धारण किया। पहले उसका एक ही कलर था, अब अनेक कलर आएंगे। आत्मा की तो कोई इच्छा-अपेक्षा होती ही नहीं है। पानी फ्रिज में रखे तो एकदम बर्फ थोड़ी ना होता है, लेकिन जैसे ही रखे, बनना चालू — भले आपको नहीं दिख रहा है। इसलिए हम ये नहीं कह सकते कि जीव पहले आया या इच्छा-अपेक्षा पहले आई। जन्म-मृत्यु आत्मा नहीं लेता, जन्म-मृत्यु में जीव जाता है — जब उसने कभी ना कभी कुछ स्वीकार किया, उस स्थिति में वह कुछ बन बैठा। जैसे आप विद्यार्थी कब बनते हो? जब आप पढ़ना स्वीकार करते हो; अगर पढ़ना स्वीकार ना करो तो मार-मार के कोई विद्यार्थी नहीं बना पाएगा। चोर वो तभी बनेगा जब चोरी करेगा खुद।
चित्त — मतलब आप जा रहे थे, कोई आपको धक्का मार दिया, अपमानित कर दिया; आपको 56 प्रकार का भोजन रखा गया है लेकिन चित्त कहां लगा? जिसने अपमान किया। या फोन आया कि तुम बाप बन गए — 56 प्रकार का भोजन रखा है लेकिन चित्त उस बच्चे में लगा है जिसे देखा भी नहीं। मन आपके शरीर की जरूरत के लिए काम करता है। बुद्धि से आदान-प्रदान समझ के करते हैं। और अहंकार तब होता है जब आप किसी को नीचा दिखाना चाहते हो, तो वहां अहम भाव आता है; मैं के बाद जब उसे आप गिराने का प्रयास करते हो, प्रतिक्रिया देते हो, तो वहां अहंकार काम आता है। इन चारों का स्थान शरीर में कहां है — कोई कुछ बोल नहीं सकता। ये कोई शरीर का अंग नहीं है जो इसका स्थान होगा; बस वो भाव है, पैदा होता है, आता है और जाता है। जैसे दर्द — जहां चिकोटी काट लोगे वहीं दर्द होगा; दर्द कहीं भी हो सकता है।
सबका आत्मा एक जैसा है — एक से है और एक जैसा है। जैसे विश्व में जितने भी बल्ब जल रहे हैं उसके पीछे विद्युत एक ही जैसा है; ये भी बोल सकते हैं कि विद्युत एक ही है, क्योंकि विद्युत एक ही जगह से आ रहा है। बल्ब का उजाला अलग-अलग है, जैसा बल्ब का कलर है, लेकिन विद्युत तो एक ही जगह से है और एक ही जैसा है। फिर भी कहेंगे इसका 33000 वोल्टेज है, इसका 420 — वोल्टेज कम-ज्यादा तो होता है; एक ही जैसा है लेकिन किसी की पावर ज्यादा, किसी की कम। बस वही बात है।
कौन बोला कि परमात्मा की इच्छा बिना कुछ नहीं होता है? परमात्मा वही है जो इच्छा नहीं करता है — ये क्यों नहीं समझ रहे हो आप लोग? एक तरफ कह रहे हो उसकी कोई इच्छा नहीं है, वो अकर्ता है, अजन्मा है, निराकार है, और एक तरफ कह रहे हो कि उसकी इच्छा के बिना पत्ता नहीं हिलता — अब बताओ दोनों बातें कैसे हो सकती हैं? कभी पेड़ को देखा है — जो हल्के पत्ते हैं वो ज्यादा हिल रहे हैं, जो बड़े हैं वो कम; अगर उसकी इच्छा से हिलते तो दोनों एक ही जैसे हिलते। हमारे साथ एकदम खिलवाड़ किया जा रहा है — दोनों बातें तुमसे एक आदमी कह रहा है और तुम ताली बजा रहे हो। क्या तुम्हारे पास बुद्धि, विवेक, समझ नहीं है कि आप उसका तुरंत खंडन कर दो? पत्ता उसकी मर्जी से हिले और चाहे ना हिले, अपने को क्या करना है वो देख लो; मैं उस पत्ते से तो अलग हूं ना। तुम पत्ते में अटक गए — तो पत्ते से बाहर निकलो। ये बेईमानी क्या है? अपनी मर्जी है। बस देख लो क्या करना है।
सही पकड़ा आपने, एकदम सही। जब तक आप कर रहे हो तो वो नहीं कर रहा है; आप करने से मुक्त हुए तो वो कर रहा है, फिर वो करता है सब। इसलिए ये संतों ने कहा — जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं — उसका भी यही मतलब है। लेकिन हम पकड़ते कहां हैं इन मतलबों को? जब खुद एकता हो जाओ तब पता लगेगा। हम एक को बस पकड़ते हैं — भूख। जीव-जंतु जितने पृथ्वी पर हैं सब भूख को पकड़ लेते हैं; एक छोटा सा अबोध बालक भी भूख को पकड़ लेता है, उसे पता है रोऊंगा तो मिलेगा। भूख लगी, मुझे भोजन चाहिए — वो भोजन जो शरीर को पोषण दे, बस वही; लेकिन भूख मेरे तरीके से मिटनी चाहिए, मिर्ची चार चाहिए वो भी तीखी, अचार नींबू का नहीं मिर्ची वाला चाहिए — ये स्वाभाविकता में नहीं आता। ये तुम पकड़ रहे हो, इसी में फंसे हो; कहीं ना कहीं हम भूख में, और वो भी अपने तरीके में, उलझे हुए हैं।