प्रश्नोत्तर P1-0023 · भाग 1
गुरु जी, मैं विचलित रहता हूं।
विचलित तो रहोगे ना, जब कुछ करोगे ही नहीं। बाहर की चीजें बढ़ती जा रही हैं और सिर पर बोझा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि कुछ बोझा उतार तो रहे नहीं, सत्कर्म में तो लगा नहीं रहे। तो विचलित नहीं होगे तो क्या होगे? अभी तो विचलित हो रहे हो — गिर मत जाना, नहीं तो पूरा बोझा भी नीचे गिरेगा और तुम भी गिर जाओगे।
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