देखो, अगर हुआ होता तो मैं खुद कहता। अगर किसी विद्यालय से विद्यार्थी पास हुआ है तो विद्यालय खुद कहेगा, विद्यालय कभी नहीं छुपाएगा। लेकिन विद्यालय ने ही फेल की मार्कशीट दे दी तो फिर फेल ही है। ऐसे लोगों का नाम लेने का कोई मतलब नहीं है। अगर यहां से कोई उपलब्ध होगा तो घोषणा पहले मैं ही करूंगा। विद्यालय पहले विद्यार्थी के पास होने की घोषणा करता है, विद्यार्थी नहीं कर सकता।
नहीं, हिंसा नहीं हुई। जब मुझे तकलीफ होती तो हिंसा होती; मुझे ऐसी कोई तकलीफ भी नहीं होती है। चाहे आंखों में आंसू आएं, चाहे हंसी हो, मैं अंदर से खुश रहता हूं, हंसता ही रहता हूं और काम करता रहता हूं। अगर मैं जानबूझकर विपरीत करता — कि गर्मी है तो बर्फ में सोता, ठंडी है तो और बर्फ ले लेता अपने आप को सताने के लिए, और गर्मी है तो और आग जला लेता — तब मैं अपने आप को कष्ट दे रहा होता, क्योंकि मैं विपरीत परिस्थितियां पैदा कर रहा होता। लेकिन ऐसा मैंने कुछ नहीं किया। जितने में इस शरीर में रह सकते हैं उतना तो ख्याल रखना ही पड़ेगा, क्योंकि काम करना है तो शरीर को उतना तो रखना पड़ेगा जितने में आप काम कर सको।
तो मैं आपको बता दूं, मैं कभी नहीं पहनता। मैं सिर्फ एक कपड़े में जीवन व्यतीत करता, और जैसे मैं जी रहा था फिर वैसे ही जीता। कपड़ा मैं एक ही पहनता और एक ही में मैं शरीर छोड़ देता।
ईमानदारी से करो। और नहीं कर पा रहे, मतलब आप उस पद के लायक हो ही नहीं। जब अपने पद का काम ईमानदारी से नहीं कर पा रहे हो तो आप उस पद के लायक नहीं हो, तो आप इस्तीफा तो दे ही सकते हो। आप जिस पद पे हो, उस पद का काम करो, बात खत्म। अगर आपको इस्तीफा देना पड़े तो इस्तीफे का कारण लिख दो — कि इस व्यक्ति के द्वारा ऐसा करवाया जा रहा है, इसलिए मैं इस्तीफा दे रही हूं, क्योंकि मैं अपने पद का काम नहीं कर पा रही, मेरा दुरुपयोग हो रहा है और मैं अपने पद का दुरुपयोग करने नहीं दूंगी। चाहे कुछ भी हो।
आप किस दिशा में कमजोर हैं — धन में, तन में या समझ में? अगर धनवान बनना चाहते हैं तो बिजनेस-व्यापार करें, ऐसे व्यक्ति का साथ पकड़ें। अगर आप शरीर से कमजोर हैं तो फिर शरीर को खूब खिलाएं-पिलाएं। अगर आप समझ से कमजोर हैं तो एक समझदार व्यक्ति का साथ पकड़ें और जीवन में आगे बढ़ें, अपना आत्मिक कल्याण करें, उद्धार करें।
आप समझ लिए, लेकिन मेरे लिए इनका भी तो महत्व है। ये जब तक नहीं समझेंगे तो इनके तरीके से हमें समझाना पड़ेगा ना। चाहे एक बार में समझें चाहे 100 बार में, कम से कम ये तैयार तो हैं। जितना मैं बोल रहा हूं उतना ये भी तो मुझसे बात कर रहे हैं; जब ये नहीं थक रहे तो मैं क्यों थकूं? ये जैसे समझेंगे मैं वैसे समझाऊंगा, और तब तक प्रयास करूंगा जब तक ये तैयार हैं। यहां सबकी अपनी-अपनी समझ है, सब अपनी समझ से यात्रा करते हैं, और हम सबके लिए काम कर रहे हैं। जब मुझे फाइनली पता चल जाएगा कि इस व्यक्ति में अभी समझने की क्षमता नहीं, तब बता दूंगा कि अभी आप इस बात को समझने लायक नहीं हो — जैसे छह-सात साल का बालक कहे मेरा विवाह करा दो, तो कहेंगे बच्चे अभी तुम विवाह के लायक नहीं हो, लायक बनोगे तब करवा देंगे। आप समझ गए, अच्छी बात है; समझने के बाद चुप रहिए, कुछ और नया आपको मिलेगा। ये प्रकृति विद्यालय है — दो में से एक बन जाओ, या तो सीखने वाले या सिखाने वाले। सीखने वाले हो तो सिखाने की बात कतई मत करना, नहीं तो भटक जाओगे।
जिस तरीके से लगे हो, लगे रहो। जब समय मिले आ जाओ, प्रयासरत रहो। ऐसा नहीं कि चलो चार साल के बाद शुरुआत करेंगे — नहीं, लगे रहो। जितना समय मिलता है, रोज आप सत्संग सुनो, व्यवहारिक जगत में अपनाओ, और अपने आप को जांचो कि मेरे में बदलाव हो रहा है कि नहीं — उठने-बैठने, बोलचाल में।
अगर उनका वही काम है, उस काम के लिए वो रखे गए हैं, तो वो करवाना चाहिए; अगर नहीं करवाओगे तो उनका ग्रोथ नहीं होगा — ये जीवन में याद रखना। किसी काम के लिए व्यक्ति उस पद पे है और आप सोचोगे मैं ही कर लेता हूं, तो उस व्यक्ति का स्तर गिर जाएगा, क्योंकि उसी काम के निमित्त से तो वो उठता है, और आपने उसका मौका ही छीन लिया। और जिस पद के लिए वो है, उसी पद का उससे काम लो, तभी उसका स्तर उठेगा। अगर उससे और कुछ करवाओगे तो या तो दबाव-संकोच में करेगा, अंदर में अनेक तरह की गालियां देगा, उसे घुटन होगी और आपसे बदले की भावना रहेगी।
नहीं, तो आपको चाबी नहीं लेनी चाहिए; जाके गेट पे खड़े रहना चाहिए — हो सके तो एक कुर्सी लेके गेट पे बैठे रहो। कुछ भी हो जाए, धैर्य रखना पड़ता है। ज्यादातर लोग डरते हैं, एडजस्ट कर लेते हैं; पर वो आदमी जिस पद पे है, अगर वो काम नहीं करेगा तो उसका ग्रोथ कैसे होगा? पहले ठीक करने का प्रयास करिए। भागना उपाय नहीं — भागिए मत, लेकिन ठीक करने का पूरी तरह प्रयास करिए। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति, डिपार्टमेंट सब अलग-अलग होता है, इसलिए कभी-कभी व्यक्ति को ना चाहते हुए भी समझौता करना पड़ता है; लेकिन उस समझौते में भी हमें अपनी ईमानदारी रखनी है। हम समझौता करेंगे लेकिन उसमें भी ईमानदारी रखेंगे; अपनी स्थिति देखेंगे, हम गिरेंगे नहीं — जिस पद पे हूं, उस पद का ही काम करूंगी।
अब मैं आप लोगों से पूछता हूं — आप लोग इस जंगल में क्या करने आए? छुट्टी मिली थी, आराम करते; आराम तो बहुत बार करके ले लिया। कुछ तो समझ में आया तभी इस जंगल में आए। अगर आपको जगत कल्याण करना है तो पूरा मिटाना पड़ेगा; अपना कल्याण करना है तो धीरे-धीरे मिटेगा, लेकिन पक्का मिटेगा। फायदा इतना होगा कि आप टेंशन से मुक्त हो जाएंगे — जब तक कुछ है तभी तो टेंशन है, आपके पास कुछ नहीं रहेगा तो टेंशन ही खत्म हो जाएगा। जैसे कार्बन डाइऑक्साइड से घुटन है तो ऑक्सीजन मिल जाए। जैसे मकड़ी का जाल बनाते-बनाते खुद उसमें फंस गए — अब घुटन छोड़ना आपको पड़ेगा, पूरा फैसला आपको लेना पड़ेगा: अब त्याग ही परम सुख है, जितना भोगना था, जितना रस लेना था ले लिया, अब नहीं चाहिए।
वो तो कर ही रहे हो। संन्यासी बनने के लिए तो बस रुक जाओ यहीं, और फुल टाइम लग जाओ — तो उसमें फास्ट हो जाएगा। आप खुद समझो ना, एक आदमी फुल टाइम पूरी तरह वही काम कर रहा है और एक आदमी दो घंटा कर रहा है, तो जल्दी कौन पहुंचेगा? इतना तो समझ आपके पास है; डर लग रहा है ना अस्तित्व मिटाने में। जिम्मेदारियों के साथ भी हो सकता है, कौन बोला नहीं हो सकता — लेकिन फास्ट कैसे होगा? ट्रेन के टिकट पे सोच रहे हो प्लेन का टिकट मिल जाए — थोड़ी मिल जाएगा; उसके लिए आपको पे करना पड़ेगा।
दे तो रहा है। रोज सुन रहे हो तो ताकत मिल रही है कि नहीं मिल रही है — आप खुद आजमाइए, कि सुनने के पहले क्या स्थिति थी, सुनने के बाद क्या स्थिति हुई। और जो छटपटाहट हो रही है, पास्ट की चीजों को लेकर, उसे देखते रहो — छटपटाहट क्यों हो रही है? मानसिक पीड़ा हो रही है तो देखो क्यों हो रही है; धीरे-धीरे समझ में आ जाएगा। आदत है तो या तो वहां जाओ या छोड़ो — ये आप ही के ऊपर है। आप ही की समझ को विकसित करना पड़ेगा, आप ही को छोड़ना पड़ेगा, समझ के छोड़ना — यही मार्ग है।
देखना है कि क्या वो अध्यात्म है। आप जहां से जुड़े हो, क्या वहां अध्यात्म है, कि कथा है, प्रवचन है, सामाजिक गतिविधियां हैं — ये देखना है। वो आत्मा को उठाने का काम कर रहे हैं, चैतन्य अवस्था में ले जाने का काम कर रहे हैं, या वो शरीर की सेवा कर रहे हैं — वो देखना है आपको। क्या वो संस्था समझ को विकसित करने के लिए काम कर रही है, या सिर्फ शरीर के लिए काम कर रही है — ये देखना है।
एक बात बताइए — वो व्यक्ति नहीं समझा, लिप्त था; और आप समझ के भी उसी में लिप्त थीं, तो दोनों एक ही जगह मिलोगे। बल्कि वो माफी के काबिल है, उसको तो समझ में ही नहीं आया; तुम तो उससे भी ज्यादा बेवकूफ निकले। कसूर आपका कि आप निकल सकते थे, नहीं निकले — उन्हें देखने में जिंदगी गुजार दी कि ये चल नहीं रहे हैं, और तुम में चलने की ताकत थी तो तुम चले ही नहीं। जिसे मार्ग समझ में आ गया, उसे तेजी से यात्रा करनी चाहिए; पुराने प्रश्न को ढोना नहीं — आगे बढ़ो और आगे का प्रश्न करो।
जीवन जीने की कला यही है कि हम कुछ करें तो हमारे कुछ करने से किसी को तकलीफ नहीं हो — इसका विशेष ध्यान रखें। इतना अगर आपने ध्यान रखा तो आप जीवन उचित तरीके से जिएंगे, ईमानदारी से जीवन जीते हुए निकल लेंगे। अगर आपने ये भाव रख लिया तो ये आपको कुछ ऐसा करने ही नहीं देगा जो आपके विपरीत हो, समाज के विपरीत हो, परिस्थिति के विपरीत हो; ये भाव ही आपको हमेशा अपने आप में, स्वयं में बना के रखेगा। इस तरीके से अगर आपने जीना चालू किया तो मुक्ति से मोक्ष तक, उस परम सत्ता तक, स्वयं तक आप अपने आप पहुंच जाएंगे — फिर अलग से साधना करने की जरूरत नहीं, आपका जीवन ही साधना हो जाएगा। मुझे वह काम करना है जिसमें मैं जी सकूं, और मेरे काम से अगर मैं किसी को लाभ दे सकूं तो वह भी ठीक है; अगर नहीं दे सकूं तो दुख तो ना दूं। क्योंकि ज्यादातर हम दुख और सुख के चक्कर में परेशान हैं — अपने लिए सुख, दूसरों के लिए दुख। हमारे करने से, बोलचाल से, उठने-बैठने से कितने लोगों को तकलीफ होती है, उसका हम ध्यान ही नहीं रखते।
अगर आपको लग रहा है कि मेरा फर्ज है, तब तो करो; लेकिन लग रहा है कि फर्ज से बाहर हो रहा है तो त्याग कर दो — गुलामी में, दबाव में मत करो। क्या सच में आपने उस काम को जिम्मेदारी से लिया है? उस काम का कुछ चार्ज ले रही हो? तब तो आपको करना पड़ेगा। अगर आपने बांट दिया है कि यह मेरा काम है और वह आपका, तब तो सामने वाले से बड़ाई की उम्मीद ही मत रखो; नहीं तो आपसे जितना हो सकता है उतना करिए, इससे ज्यादा चाहिए तो वो खुद कर लें। हमारे करने से किसी को तकलीफ ना हो, यह ध्यान मुझे रखना है; लेकिन किसी के करने से मुझे भी तकलीफ हो रही है तो उस जगह, उस व्यक्ति का त्याग कर दो। बुद्धिमानी यह नहीं कि आप तकलीफ झेलती रहो — तब तो आप अपना शोषण करवा रही हो। शोषण करना अगर पाप है तो करवाना भी तो पाप है। जीवन को इस तरीके से जियो — ना तो गुलाम बनना है, ना किसी को गुलाम बनाना; ना दबाव में जीना है, ना किसी को दबाव में जिलाना; ना प्रभाव देना है, ना लेना है; ना शोषण करना है, ना करवाना है।
जहां आप खुल जाओ, जहां अपनी बात रख सको, और आपकी भावनाओं को सामने वाला समझ के आपको जवाब दे — वही अपना होता है। आप रिश्ते से मत जाइए, मैं पूरे ब्रह्मांड की बात कर रहा हूं। अगर कोई अपना है तो हमारी खुल के बात सुनेगा और मुझे सत मार्ग बताएगा; और अगर कोई पराया है तो मुझे दबाएगा कि आप बोलो मत। उसके अंदर आपके लिए अपनत्व का भाव ही नहीं, चाहे वो आपके घर का हो चाहे बाहर का। जो व्यक्ति हमारी बात नहीं सुन रहा, हमारी भावनाओं को नहीं समझ रहा, वह पराया है — वहां रुकने का कोई मतलब नहीं, उसके साथ रहना अपनी जिंदगी को बर्बाद करना है। आप वहां जाइए जहां आपकी भावनाओं की कद्र की जा रही है। अपना कभी पराया नहीं हो सकता और पराया कभी अपना नहीं हो सकता, इसलिए खुल के जियो। जहां बोलने के पहले मुझे सोचना पड़ रहा है, जहां दबाव-संकोच है, वहां अपने नहीं, पराए लोग रहते हैं — उस भीड़ से, उस झुंड से निकल जाना ठीक है, वो आपको घुटन में रखेगी, कमजोर बना देगी; वहां मोह और बंधन में मत आओ। जिंदगी तो बोझ तब लगती है जब जिसे हम अपना समझते हैं वह मुझे समझता नहीं।
नवधा भक्ति — आप देख लो, बहुत जगह लिखा होगा: आठ सिद्धियां हैं, नौवीं भक्ति है। आठ सिद्धियां जो छोड़ता है उसको नौवीं भक्ति मिलती है। जिसे कुछ नहीं चाहिए, वो आठ सिद्धि पार करके नौवीं भक्ति में चला जाता है; और जिसे कुछ चाहिए, वो आठ सिद्धियों के नीचे पड़ा रहता है। बस यही है।
नारियल इसलिए फोड़ते हैं कि उसको पूर्ण फल माना गया है। क्योंकि उसमें देखिए — ऊपर छिलका भी है, उसके ऊपर एक और परत है, फिर उसके ऊपर और है, पानी भी है; तो पूर्ण फल माना गया, उसमें सब है, इसलिए फोड़ते हैं।
ऐसा कुछ करो कि परमात्मा आपको पा ले। क्योंकि आप उससे छोटे हो, तो परमात्मा को आप कैसे पाओगे? अगर वह आपसे छोटा होता तो आप उसे पा लेते। ऐसा कुछ काम करो कि वो आपको पा ले।