प्रश्नोत्तर P1-0124 · भाग 1
घर (संसार) छोड़ना पड़ता है, या अपने आप छूट जाता है?
समझते-समझते सब छूट जाता है। आप छोड़ नहीं सकते। अगर आप छोड़ोगे तो आसक्ति रहेगी, बंधन रहेगा। जैसे-जैसे समझोगे, छूट जाएगा।
जैसे देखिए, बालक का जन्म होता है। पहले वह कुछ भी उठाकर मुंह में डालता है; धीरे-धीरे समझ बढ़ती है तो वह छूट जाता है। फिर खिलौना खेलने लगता है; खिलौना टूट जाए तो रोने लगता है। उसे बड़ी कार दो, बड़ा घर दो, महल दो — खुश नहीं; एक खिलौना ला के दे दो तो खुश हो जाता है। फिर जैसे-जैसे उसकी समझ विकसित होती है, खिलौना सामने पड़ा रहता है, कोई मतलब नहीं। फिर बड़ी गाड़ियों में, घरों में फंस जाता है। फिर जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, इससे भी छूट जाता है।
लेकिन एक बात बताऊं — यह शरीर बड़ा होने से नहीं होता। बहुत लोगों की समझ विकसित नहीं होती तो 20–30 साल में भी खिलौना खेलते रहते हैं, क्योंकि शरीर तो बड़ा हो गया लेकिन समझ विकसित नहीं हुई। जैसे-जैसे समझ विकसित होगी, सब छूटता जाएगा और आप उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे। आप कहीं लिप्त हो, तो कहीं न कहीं आपकी समझ विकसित नहीं हुई, इसलिए लिप्त हो। समझ विकसित होगी तो अपने आप छूट जाएगा, छोड़ना नहीं पड़ेगा। तो समझ विकसित करो।
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