प्रश्नोत्तर P1-0147 · भाग 1
मैंने एक संत से सुना कि जो ‘मैं हूं’ का अनुभव है, उसमें स्थित रहो, स्थिर रहो। लेकिन जब मैं कहीं लिप्त हूं, तो स्थिर कैसे रहूंगा?
एक रबड़ उस पेड़ से बंधा है। मैं उसे वहां से छुड़ाए बिना खींचकर ला रहा हूं, तो कब तक खींचे रहूंगा? मेरी ताकत खत्म होगी, रबड़ वहीं चला जाएगा। आप (ऐसे) स्थिर नहीं रह सकते। स्थिर तब हो जाओगे जब जहां लिप्त हो, वहां से निकल जाओगे। केवल समझकर (मानकर) आप स्थिर नहीं हो सकते; छुड़ाकर, छूटकर स्थिर हो सकते हो। तो ऐसा कुछ करो कि जहां मैं बंधन में फंसा हूं, वहां से छूट जाऊं।
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