आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P11-0024 · भाग 11

मैंने घर वालों से कहा है कि मेरे लिए किसी प्लॉट में एक कुटिया बनवा दो, उसमें रहकर साधना करूंगी।

अगर तेरे घर वाले कुटिया बना के दे देंगे, तो उसमें साधना नहीं हो पाएगी। साधना हमेशा "तेरा" में होती है, "मेरा" में नहीं; नहीं तो राजा-महाराजा अपना घर छोड़ के क्यों जाते? ध्यान रखना — जब तक आत्मज्ञान ना हो, अपनी कुटिया बना के कभी मत रहना, कुछ नहीं होगा; क्योंकि तुम्हारा अहंकार यही सोचेगा — ये मेरा घर, ये बेड, ये पर्दे; वहां सब कुछ आपके तरीके से होगा, और आपके तरीके से आपका पतन के अलावा कुछ नहीं होगा। इसलिए कहा गया है जीवंत गुरु ढूंढो; जब उसके तरीके में रहोगे, तो वह डांट के रखेगा — चल उठ, वहां बैठ; बुरा लगेगा, तब अपनी स्थिति का पता चलता है। "मेरा" में कोई नहीं कहेगा। अष्टावक्र ने राजा जनक का सिंहासन ही छुड़वा दिया — चल मेरे साथ, तेरे राज्य में नहीं, सही ज्ञान तुझे वहां होगा जहां तेरा अधिकार नहीं। आश्रम में राजा-रंक एक ही जगह बैठते हैं, क्योंकि वहां सब एक समान हैं; जहां राजा-रंक अलग बैठें, समझ लेना वह जीवंत, आत्मज्ञानी गुरु नहीं है। इसलिए मैंने 12 साल तक अपने लिए कभी कुटिया, कभी झोपड़ी नहीं बनाई — कभी मंदिर में रहा, कभी पेड़ के नीचे, कभी नर्मदा किनारे, कभी श्मशान में सो गया।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 22 फरवरी 2026 #योगी · 2026-02-22