प्रश्नोत्तर P12-0008 · भाग 12
आश्रम में रहने वालों की तो आप सेवा कराकर समझ खोल देते हैं; पर गृहस्थ तो निरंतर उसी दलदल और माहौल में रहते हैं, जल्दी आ भी नहीं पाते। वे बहुत ईमानदार रहने की कोशिश करते हैं, फिर भी गिर जाते हैं। लोग गुरु की फोटो टांग लेते हैं, पूजा-पाठ करते हैं कि गुरु जी पास हैं — तो वे कैसे समझें कि गिर रहे हैं या उनसे कमी हो रही है, और कैसे सुलझें?
गुरु के एक-एक शब्द में, एक-एक वाक्य में जीना। जब कोई कर्म करे, तो सोचे कि गुरु जी इस काम का अंजाम किस नजरिए से देखना पसंद करते हैं — मैं उसी तरीके से करूंगा, ताकि मैं दिल खोलकर, आंख मिलाकर कह पाऊं कि आपने जैसा बोला, वैसा ही मैंने जिया, मेरा भाव शुद्ध था। भले उसका परिणाम कुछ भी आए, क्योंकि काम तो बहुत लोगों के थ्रू होकर जाएगा; मुझे परिणाम से मतलब नहीं — मैंने किस भाव से कर्म किया, वह मायने रखता है। परिणाम मेरे हाथ में नहीं है; मेरे हाथ में बस इतना है कि मैं कर्म ईमानदारी से करता हूं या बेईमानी से।
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वीडियो: जो कहता हूं वह बस करता रह #योगी · 2026-10-17