प्रश्नोत्तर P12-0078 · भाग 12
शुभ कर्मों से शुभ कर्म बनता है और अशुभ से अशुभ; तो ईमानदारी-सत्कर्म से मुक्ति कैसे होगी? इससे भी तो प्रारब्ध बनेगा — क्या यह भी बंधन नहीं हो जाएगा?
नहीं। सत्कर्म मतलब जरूरतमंद की सेवा — वहां कर्ता का भाव होता ही नहीं, इच्छा-अपेक्षा होती ही नहीं। जब आप बोलकर कर रहे हो, तो वह सेवा है; वह बीज की तरह है — या तो लगा सकते हो, या खा सकते हो। और सत्कर्म का फल फल की तरह है — उसकी गुठली डाल दोगे तो वह हजारों साल तक फल दे सकता है। सत्कर्म में बंधन नहीं है, क्योंकि सत्कर्म में कोई उम्मीद नहीं है — निष्काम कर्म को ही समझिए; सत्कर्म नया शब्द है। उसके बदले में आपको कोई आश्वासन नहीं दिया गया है। जैसे यह बालक पेड़ों को पानी देता है; अगर कल नियम तोड़ दे तो उसे भगा दिया जाएगा, तब वह नहीं कह सकता कि मुझे इसमें से कुछ दो, क्योंकि आश्वासन ही नहीं दिया गया। जहां आश्वासन ना हो, वह सत्कर्म है; जहां आश्वासन हो कि आपको यह मिलेगा, वह सत्कर्म नहीं — वह तो काम के वेतन की तरह हो गया, वेतन किसी भी रूप में लो।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 4 जनवरी 2026 #योगी · 2026-01-04