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प्रश्नोत्तर P12-0109 · भाग 12

बुद्ध और आप — बाहर से तो हमसे कम ही दिखते हो, फिर आप कहां स्थित हो कि इतने आनंदित हो? मैं तो अपना दुख मिटाने आई थी, आप दुख की जड़ पर ही वार कर देते हो। मुझे तो यह भी नहीं पता कि मैं रियल में चाह क्या रही हूं।

जैसे आपने जीवन में शुरुआत की और अपनी समझ से कोई लक्ष्य प्राप्त किया, और कोई व्यक्ति आपसे प्रभावित होकर उस लक्ष्य तक पहुंचना चाहे, तो आपकी हर बात मानेगा तभी पहुंचेगा। आपने कहा दाएं और वो मुड़ गया बाएं, तो क्या वो पहुंचेगा? एक बार अगर गलत मुड़ा तो आगे का सारा रास्ता गलत है। तो आप जिससे प्रभावित हुए हो, जिसके पास गए हो कि मैं आपकी तरह आनंदित होना चाहता हूं, तो उसके बताए अनुसार ही करो। अपने अनुसार तो आपने कर ही लिया है; तो जितना कह रहा है उतना ही करो — ना ज्यादा, ना कम। ज्यादा में भी भटक गए। मुझे अपनी बुद्धि लगानी ही नहीं है, क्योंकि अपनी बुद्धि से मैं जहां हूं वहां परेशान ही तो हूं। इंतजार करो कि वो क्या कहेगा, क्योंकि आपकी स्थिति देखकर ही बोलेगा — आप स्वीकार कर पाते हो कि नहीं, आगे बढ़ पाओगे कि नहीं। पीछे का जितना दिया था, वो कर लिया, तब वो आगे का देगा; पीछे वाला ही नहीं किया तो आगे देगा ही नहीं। जैसे गणित में एक भी अंक इधर-उधर कर दिया तो नीचे का सारा गलत, और मायने तो आखिरी उत्तर रखता है, परिणाम रखता है। आप आनंद के लिए आए थे ना, तो जितना बता रहा है सिर्फ उतना करो — फिर अपनी बुद्धि लगाने की क्या जरूरत है?

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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17