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प्रश्नोत्तर P12-0161 · भाग 12

आपको 2020 में (उपलब्धि) घटित हुई थी। उससे पहले की आपकी कहानी थोड़ी सुनाएंगे? जो भटकाव आपके जीवन में था, वो अब हमारे जीवन में आया है — तो उससे हमारा थोड़ा मार्गदर्शन हो सके, हम अपने आप को उससे जोड़ पाएं।

2011 में ऐसा लगा कि इस संसार में, चाहे मैं हूं चाहे कोई भी, अपने मतलब से लेन-देन में लोग प्यार जता रहे हैं, पर प्रेम है नहीं — कुछ पाने में प्रेम है, ना मिले तो गया। आखिर सच में प्रेम क्या है? कुछ तो है जो सदैव रहे; ये तो आज नहीं कल छूट जाएगा, शरीर भी छूट जाएगा। तो संन्यासी हुआ — बनना कुछ नहीं था। फिर आश्रम में देखा तो वही; मैंने कहा मुझे ये नहीं चाहिए, कुछ और चाहिए। गुरु से बात की तो उन्होंने कहा, जो तुझे चाहिए वो मैं नहीं दे सकता, जा ढूंढ। मैंने कहा मैं ढूंढ के रहूंगा — फिर 12 ज्योतिर्लिंग, चारों धाम, गंगासागर की यात्रा की, कि प्रभु ये मत कहना मैं तुम्हारे पास आया नहीं था। आखिर में स्थिति पागल जैसी हो गई — बाहर की सारी उम्मीदें खत्म, धन-रुपया, नाम-शोहरत, जमीन-प्रॉपर्टी, आश्रम, गुरु-शिष्य कुछ नहीं बचा, मैंने कभी कुछ बनाया ही नहीं, बस खोज में रहा। जीने का कोई आधार ही नहीं था — कुछ तो चाहिए तभी जी पाओगे — और इतना ज्ञान भी हो गया था कि मर भी नहीं सकता। आखिरी स्थिति बहुत भयानक थी। खोज में लोगों ने कहा जन्म-जन्म लगते हैं, मैंने कहा नहीं, इसी जन्म में करेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए — तो आखिर में अपने आप हो गया। पहले भी लोग कहते थे आपके पास ज्ञान है, तो मैं कहता था ये ज्ञान मेरा नहीं, बाहर से सीखा हुआ है, इसके लिए मैं नहीं निकला; कोई मार्ग पूछता तो कहता, अभी मुझे पता नहीं, जब उपलब्धि होगी तब बताऊंगा। 2020 में, नर्मदा तट से मुंबई तक के बीच, प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। मैंने कहा था जिस दिन ज्ञान समझ आया उस दिन मैं लोगों तक जाकर दूंगा, ये नहीं कि लोग मेरे तक आएं — इसीलिए आज गांव-गांव घूमकर उन लोगों तक ज्ञान पहुंचा रहा हूं जो अध्यात्म के बारे में जानते नहीं। जिसके लिए इतना भटका, वो मिल गया तो पता चला अब ये मेरे काम का ही नहीं, लोगों के काम का है; व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक दे रहा हूं, जिसको लेना है ले सकता है।

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वीडियो: कोई रास्ता दिखाओ... #योगी · 2026-07-12