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प्रश्नोत्तर P12-0177 · भाग 12

गुरु जी, मैं आपको सूरत में तापी (नदी) पर आश्रम बना देना चाहता हूं।

बस, बहुत हो गया। एक बनाया, उस पर 15 लाख का कर्ज है, अभी भरना है; दूसरा बना रहा हूं, उसमें भी कैसे-कैसे करके कर रहा हूं। अब आश्रम नहीं — एक वहां हो गया, एक यहां, जहां आकर साधक साधना करें, इसी को चलाना है। आज मैं यहां हूं, पर अदरपुरा की व्यवस्था भी मुझे ही देखनी पड़ रही है। आश्रम बनाना बड़ी बात नहीं, उसको जिम्मेदारी से चलाना बड़ी बात है — ऐसा ना हो कि नशे का अड्डा बन जाए, या जिस उद्देश्य से बनाया उस पर काम ना हो। मुझे आश्रम का शौक नहीं है, मुझे काम का शौक है।

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