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प्रश्नोत्तर P13-0082 · भाग 13

कई साधु खाए-पिए बिना रह लेते हैं और साधना करते रहते हैं, जबकि गृहस्थों के लिए एक दिन भी बिना खाए मुश्किल हो जाता है — उनमें कौन सी शक्ति है?

हमारा भाव काम करता है। जैसे दो आदमी को एक कमरे में बंद कर दूं — एक ने फैसला कर लिया था कल मैं व्रत रखूंगा, दूसरे ने नहीं; भोजन दोनों को नहीं मिला, तड़पेगा कौन? जिसने फैसला नहीं किया था। जिसने कहा था मैं व्रत रखूंगा, वो कहेगा अच्छा हुआ मुझे एकांत मिल गया; एक कहेगा भूख लगी है। यहां भाव की बात है। जब आप संकल्प लेते हो कि जिसमें जी रहे हो उससे ज्यादा कुछ मिलने वाला है, तब व्रत-उपवास में पीड़ा नहीं होती — खुशी होती है। जरूरत में जब हम कुछ करते हैं तो पीड़ा नहीं लगती; जरूरत नहीं और कोई करवाए तो वही पीड़ा है। यहां भाव का खेल है — भाव विद्यते देवा, भाव में ईश्वर का वास है। अपने तरीके से चाहिए का त्याग कर दो तो समस्थिति में हो जाओगे।

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वीडियो: जीवन में भाव का महत्व..! - आध्यात्मिक सत्संग - योगीजी का सत्संग - · 2025-07-30