प्रश्नोत्तर P13-0182 · भाग 13
गुरु जी, इंसान कहता है कि प्रेम सोच-समझ के नहीं होता, बस हो जाता है — और किसी एक से हो जाता है। ऐसा क्यों होता है?
प्रेम जहां कुछ नहीं चाहिए वहां होता है। प्रेम जब होता है तो एक से नहीं होता — जब प्रेम होता है ना, तो सबसे होता है। एक से जो होता है, वो तो आकर्षण है हार्मोन का। आजकल उसको प्रेम समझ लिया है, तो आपकी गलती है। यही तो प्रेम को विकृत कर दिया है। ये तो एक आकर्षण है नर-मादा का। जानवर को देख रहे हो — एक कुतिया के लिए सब कुत्ते लड़ जाते हैं, और जो कुत्ता जीतता है उसके साथ हो जाती है; और संबंध होने के बाद वो कुत्ता जाके कहीं छांव में सो जाता है, उसे उस कुतिया से कोई मतलब नहीं। ऐसी ही हमारी भी जिंदगी है। हम एक दूसरे को नोच रहे हैं — जब तक मिलता रहेगा तब तक हम आपके पास हैं; मिलना बंद हो जाएगा तो आप जैसा बुरा कोई नहीं। कल तक उसकी उम्र बढ़ाने, नौकरी-व्यापार बढ़ाने की प्रार्थना करते थे, और आज कहते हैं इसका नाश हो जाए — क्यों? क्योंकि आपके तरीके से अब नहीं हो रहा है, अब आप नोच नहीं पा रहे हो। नोचने-नुचवाने को आपने प्रेम समझ लिया। उस नोचने को प्रेम का नाम दे दिया, बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं। वो प्रेम नहीं, आकर्षण मात्र है — वो भी विपरीत लिंग का। बारह साल के बाद लगभग उत्तेजना आती है, फिर अपने आप विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण हो जाता है — वो नेचुरल है, आपके शरीर में है।
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वीडियो: प्रेम और आनंद में कैसे रहें ? - aadhyatmik pratyaksh gyan Yogi #livesatsang · 2025-04-20