प्रश्नोत्तर P14-0055 · भाग 14
गुरु जी, आपमें ये इस रास्ते वाली इच्छा कैसे उठी? और आपने किसी की बात सीधे-सीधे स्वीकार क्यों नहीं की?
मुझे समझ में आ गया था कि यहां एक-दूसरे को जरूरत के लिए मानते हैं। बचपन से भाव था कि मुझे इस जगत में कुछ ऐसा करना है जिसका हर व्यक्ति उपयोग करे — काम क्या है पता नहीं था, लेकिन यह भाव प्रबल था। विवाह नहीं करना था, यह भी प्रबल था, क्योंकि जानता था कि पत्नी, बच्चे, घर, गाड़ी — उसी में जीवन खत्म हो जाएगा। ज्योतिष देखा, उसमें भी नाम-पैसा ही था। मैं प्रत्यक्ष के लिए निकला था, थोपने और थुपवाने के लिए नहीं, इसलिए जब तक प्रत्यक्ष नहीं होता था, स्वीकार नहीं करता था। प्रत्यक्ष ना स्वीकार से मिलता है, ना अस्वीकार से — दोनों के परे जाना पड़ता है। मैंने तीन दिन में आश्रम का फैसला कर दिया था — पहले दिन संन्यास लिया, दूसरे दिन रहा, तीसरे दिन निकल गया, बोला यहां तो वही चल रहा है जो छोड़ के आया था।
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वीडियो: इतने सरल ज्ञान को इतना रहस्यमय क्यों बना दिया गया | Why is Simple Truth made so Mysterious? in Hindi · 2026-03-06