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प्रश्नोत्तर P14-0077 · भाग 14

गुरु जी, 'ईश्वर सर्वव्यापी है' — इसका क्या मतलब है? क्या ईश्वर कण-कण में, हर जगह मौजूद है?

ईश्वर सर्वव्यापी है, इसका मतलब यह नहीं कि जहां आप बोल रहे हो वहां है, क्योंकि जहां आपने बोला 'यहां है', वह मेरा में हो गया, दायरा हो गया, और ईश्वर दायरे से परे है। जैसे बल्ब से उजाला है — उजाले में आप कुछ भी करिए, बल्ब को कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और उजाले को माध्यम बनाकर बल्ब तक पहुंचा जा सकता है। वैसे ही ईश्वर से संसार भी है, ईश्वर से अनंत आत्मा है। आत्मा पिंड में आया, इच्छा-अपेक्षा में जीवात्मा हो गया, जीव हो गया, और भोग भोगने के लिए कभी यह शरीर, कभी वह शरीर धारण कर रहा है। जैसे पानी फ्रिज में गया तो बर्फ बन गया, लेकिन पानी का नाश नहीं हुआ; टूटेगा तो बर्फ टूटेगा। वैसे ही आत्मा को कोई प्रभाव नहीं पड़ता; इच्छा-अपेक्षा में, मेरा में सुख-दुख है। हम संसार में नहीं, मेरा में फंसे हैं। मेरा और कर्ता के भाव से अपने को छुड़ा लें तो जीव का नाश हो जाएगा और आत्मा परमात्मा के पास चला जाएगा। आत्मा को परमात्मा चाहिए और जीव को भोग चाहिए। भाव में ईश्वर का वास है, इसलिए भाव को शुद्ध करना है — कर्म के द्वारा भाव गंदा हुआ है, तो कर्म के द्वारा ही शुद्ध करना है। कोई मजाक उड़ाता है कि क्या गटर में भी ईश्वर है — अरे भाई, उजाला गटर में है, बल्ब थोड़ी ना गटर में है।

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वीडियो: ईश्वर सर्वव्यापी है इसका क्या मतलब है / #ईश्वर #सर्वव्यापी · 2024-04-10