प्रश्नोत्तर P14-0106 · भाग 14
गुरु जी, मनन-चिंतन की प्रक्रिया को हम जीवन में कैसे उतारें? थोड़ा विस्तार से बताइए।
सत्संग सुनिए, समझ लीजिए, फिर उस पर चिंतन करिए कि कहां-कहां फंसे हैं, मनन करिए, मंथन करिए, और कर्म करते हुए उससे अपने आप को निकालिए। पहले बाहर से, इंद्रियों द्वारा राग-द्वेष में जवाब मत दीजिए, फिर आंतरिक धीरे-धीरे समझते रहिए। जैसे दूध गर्म करके जामन डालते हैं, दही बनता है, फिर चिंतन रहता है कि कब मथना है — ज्यादा दिन रखेंगे तो खराब हो जाएगा — फिर मथ के उसका तत्व, मक्खन निकालते हैं, फिर उसको तपा के घी बनाते हैं। वैसे ही सत्संग सुनिए, देखिए कहां-कहां गलतियां हो रही हैं, चिंतन-मनन-मंथन करिए और अपने आप को वहां से निकाल लीजिए।
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