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प्रश्नोत्तर P15-0118 · भाग 15

गुरुदेव, कर्तव्य छोटा भी हो सकता है, बड़ा भी? लोग कहते हैं मेरा कर्तव्य है कि उसके लिए इतना करना है, और फिर बहुत कोशिश करनी पड़ती है।

कर्तव्य कर्तव्य होता है; ना छोटा होता है ना बड़ा। हमें ना ज्यादा करना है ना कम करना है, हमें बस जरूरत पूरी करनी है — इस शरीर की और जो हमारे साथ हैं उनकी: तन पे कपड़ा, रोटी और रहने के लिए मकान। इससे ज्यादा अगर उनकी मांग है, तो उन्हें बोल दीजिए कि मैं अपनी क्षमता अनुसार आपको दे रहा हूं; इससे ज्यादा चाहिए तो आप स्वतंत्र हैं, आप कर लीजिए, उसके जवाबदार आप होंगे, मैं नहीं। ईमानदारी से जो भी मुझे उपलब्ध होगा वह मैं लाकर दूंगा, उसमें हम भी लेंगे, आप भी लो; मैं आप लोगों के लिए बेईमानी नहीं करूंगा। और करने में अगर आप बेईमानी रखे तो मैं आपका साथ छोड़ दूंगा। त्याग ही परम सुख है — कोई भी व्यक्ति आपको गलत मार्ग पर ले जाए, उसका तुरंत त्याग करना चाहिए, जैसे राजा बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। जब भी आपसे कोई गलत करवाए, चाहे गुरु हो चाहे परिवार, उस व्यक्ति का, उस जगह का त्याग कर दो; यही बुद्धिमानी है। कर्तव्य, दायित्व ईमानदारी से निभाओ। जरूरी थोड़ी है कि कर्तव्य बेईमानी से निभाएंगे? जीने के लिए रोटी, कपड़ा, मकान चाहिए, और उतना तो आज के समय में कमा ही लेते हो। आपको सोसाइटी देखनी है, मान-प्रतिष्ठा चाहिए तो आप कमाओ, हम तो नहीं जाएंगे — सीधा बोल दो। मैं आपको रोक नहीं सकता, लेकिन इतना तो अधिकार है कि मैं नहीं करूंगा; यह अधिकार तो मेरा मुझ पर है।

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वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11