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प्रश्नोत्तर P15-0124 · भाग 15

गुरु जी, मेरे साथ एक बार धोखा हुआ था — जैसे आप बता रहे थे कि गुरु लोग चेलों का शोषण करते हैं, बर्तन मंजवाते हैं। पर उस धोखे को देखकर, समझकर मेरी और गति हुई, मैं आगे बढ़ा। इसे कैसे देखें?

आपने विरोध किया ना? उस धोखे से अपने आप को निकाला ना? ये ताकत सब में नहीं होती। बहुत लोग उस धोखे में पड़े हैं; बहुत कम लोग निकल पाते हैं। धोखा होने पर वही आदमी उन्नति करता है जो विरोध करता है। आप अपनी जगह सही हैं, लेकिन जहां वो बैठा है, जो उनका समूह है, उनके लिए तो आप विरोधी हुए — क्योंकि जो वो आपको बनाना चाहते थे, गुलाम, वो आप नहीं बने; उनका एक गुलाम कम हो गया। जैसे एक अच्छी टीम है, एक बुरी टीम; एक आदमी जाते-जाते बुरी टीम में पहुंच गया, और जब पता चला तो अच्छी टीम में आने का प्रयास किया — तो उसने सही किया, लेकिन बुरी टीम का विरोधी तो हो गया; वे उसे भगोड़ा ही कहेंगे। विरोध बहुत कम लोग कर पाते हैं। ज्यादातर लोग हां या ना में चले जाते हैं; दोनों में भीड़ मिल जाएगी, पहले से संगठन तैयार है — बस झुंड में जाके कहना है कि मैं भी आपके साथ हूं, और पूरे समूह की ताकत मिल जाएगी। लेकिन हां या ना से परे भी कुछ है, जहां तुम हो; वहां की यात्रा अकेले करनी पड़ेगी, और वह बहुत कम लोग कर पाते हैं। हर आदमी संगठन में जीना चाहता है, क्योंकि समूह का एक बल होता है। अकेले वही निकल सकता है जिसको ना जीना है ना मरना है।

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वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11