प्रश्नोत्तर P15-0135 · भाग 15
गुरुदेव, हमारे एक मित्र ने बिल्कुल उम्मीद छोड़ दी है, पर इनका मन बहुत भागता है — पता नहीं मन भागता है कि ये स्वयं भागते हैं?
आपको कैसे पता चलेगा? उन्हें ही पता चलेगा। उम्मीद छूट जाए तब तो उपलब्धि हो जाए। उम्मीद में ही तो मन आता है; उम्मीद अगर खत्म हुई तो मन भी कहां? मन काम किस पे करेगा? आप माउस को घुमाना ही बंद कर दीजिए तो एरो कहां चलेगा? कुछ उम्मीद है तभी तो मन आया। आपको लग रहा है आपकी उम्मीद खत्म हो गई, पर भटकाव तो चालू है — कुछ उम्मीद है जो मिल नहीं रहा, तभी तो भटकाव है। उम्मीद वो चाहे परमात्मा की हो, चाहे भगवान की, चाहे आत्मा की — उम्मीद उम्मीद होती है। उम्मीद है तो भटकाव है, उम्मीद खत्म तो भटकाव खत्म। उम्मीद में भटकाव, और भटकाव में एक और नई उम्मीद कि मिल जाएगा। उम्मीद अगर छूट जाए तो बात ही बन जाए: खोजते-खोजते खोजने के लिए कुछ ना रहे, खोजी बच जाए; अनुभव करते-करते अनुभव करने के लिए कुछ ना बचे, अनुभवकर्ता बचे; निर्णय करते-करते निर्णय करने के लिए कुछ ना बचे, निर्णयकर्ता बचे — तब तो उपलब्धि हो जाएगी, तुरंत। उम्मीद में ही तो हम बाहर हैं; उम्मीद ले चले तभी तो भटक रहे हैं।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11