प्रश्नोत्तर P16-0121 · भाग 16
गुरुदेव, मानव जीवन की कीमत क्या है, उपयोगिता क्या है? मतलब जो शरीर हमें मिला है, इस शरीर की उपयोगिता क्या है?
इस पृथ्वी पर जितने भी शरीर हैं — 84 लाख तो बोला गया है — उनमें यह शरीर ऐसा है कि इसमें कर्ता का अधिकार है; बाकी किसी शरीर में कर्ता का अधिकार नहीं, वहां भोग और भोजन है। योग और कोई नहीं करता। और आज तक इस पृथ्वी पर जितनी सुधारने की बात हुई है, बस मानव के लिए हुई है, किसी और जीव के लिए नहीं — मतलब सबसे बिगड़ा कौन है? मानव। इसकी तीन प्रवृत्तियां हैं — सात्विक, राजसी, तामसी। इस शरीर की उपयोगिता तो यह है कि इस साधन के द्वारा उस परम साध्य तक पहुंचना है। भोग-भोजन सिर्फ जरूरत के लिए करना था, उसमें लिप्त नहीं होना था; लिप्त हमें योग में होना था, योग के द्वारा अपने स्वयं तक पहुंचना था। लेकिन इसका उपयोग हमने भोग और भोजन के लिए कर लिया, और जब दुख आता है तब हम योग करते हैं। जब हमारे बेईमानी के कर्मों से जीवन अशांत होता है, जितनी व्यवस्थाएं थीं वही घुटन देने लगती हैं, तब हम योग की तरफ बढ़ते हैं। अगर आप इस शरीर में बस ईमानदारी से जीवन जियो, सत्कर्म करो, बेईमानी मत करो, तो आप स्वयं अपने आप तक, फिर उस परम सत्ता तक पहुंच जाओगे — क्योंकि यह शरीर मिला ही है उस परमात्मा से मिलने के लिए। आपको कुछ करना नहीं था, बस जीवन जीते हुए इंतजार करना था; लेकिन आप कुछ करने लगे, करने में बेईमानी करने लगे और अपने आप को पूरी तरह उलझा दिए। अब एक तरफ बेईमानी कर रहे हो और एक तरफ निकलने का प्रयास भी कर रहे हो — ऊर्जा बेईमानी में भी खर्च हो रही है और योग में भी, तो आप मानसिक रूप से ग्रसित हो रहे हो, समझ में नहीं आ रहा मैं क्या करूं, क्योंकि आप एक तरफ नहीं हो। बेईमानी से धन भी आए और मैं स्वयं तक पहुंच भी जाऊं — ऐसा हो नहीं सकता। अब फंसा दिए हो, तो निकलने के लिए ईमानदारी से सत्कर्म करना पड़ेगा। आखिरी में तो कुछ नहीं करना है — जब पूरी तरह आपके पास कुछ नहीं होगा, तब मोक्ष। जब तक कुछ है, उससे छुड़ाने के लिए कुछ करना है। मानव ही है जो पैदा करके खाता है; बाकी जीवों को भोजन-भोग प्रकृति देती है, वो प्राकृतिक जीते हैं — भूख लगेगी तो खाएंगे, भोग का समय आएगा तो भोग करेंगे। मानव पूरी तरह स्वतंत्र है — पेट भरने के बाद भी स्वाद के लिए खाता है, भोग चाहे जब करता है। हमें अपनी समझ से भोग-भोजन का सिर्फ सदुपयोग करना था और योग करना था; लेकिन हम स्वाद में पड़ गए, मान के चक्कर में वो कर बैठे जो नहीं करना चाहिए — इस शरीर का दुरुपयोग कर दिया। अभी भी आप चाहो तो इसका सदुपयोग कर सकते हो। सात्विक प्रवृत्ति में जियो, और यह तभी होगा जब आप छोटा-बड़ा बनने की इच्छा का त्याग कर दो — छोटा भी बनना चाहे, "देखो मैं सबसे छोटा बन के दिखाऊंगा", तो वह भी अहम भाव है। फिर देखो सात्विक प्रवृत्ति में जीने लगोगे, उसमें अपने आप को पाओगे, और धीरे-धीरे अपने आप को छुड़ा लोगे — क्योंकि फंसाने की क्षमता आप में है तो छुड़ाने की भी क्षमता है। ईमानदारी में ताकत नहीं लगती, ताकत तो बेईमानी में लगती है। बेईमानी में बहुत सचेत रहना पड़ता है — 20 साल बाद भी याद रखना पड़ता है कि मैंने क्या बोला था; ईमानदारी में कोई याद रखने की जरूरत नहीं, जब मौका आएगा वही बोलोगे जो बोला था।
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वीडियो: मानव जीवन की उपयोगिता क्या है ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-11-24