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प्रश्नोत्तर P16-0135 · भाग 16

हर जीव अपने प्राण क्यों बचाना चाहता है? बहुत लोग 100 वर्ष के ऊपर चले जाते हैं; एक बूढ़ी अम्मा कह रही थीं कि अब तो सिर्फ मौत का इंतजार है, बस शरीर जल्दी छूटे और दर्द ना हो — फिर भी मौत का डर है। एक चींटी को भी मारूं तो वह भी प्राणों की रक्षा करती है। आखिर यह डर किस चीज का है?

जब तक इच्छा-अपेक्षा है, तब तक डर है। जैसे आपके पास कोई वस्तु है और खो जाए तो तकलीफ होती है — लेकिन बात अच्छी-बुरी की नहीं, जरूरत की है: जब तक आप उसका उपयोग कर रही थीं। स्टोर में चीजें पड़ी रहती हैं कि क्या पता दोबारा काम आएं; लेकिन अगर पता चल जाए कि यह वस्तु मेरे काम की ही नहीं रही, तो आप उसे हटा देते हो, और हटाते वक्त कोई दुख नहीं होता। जब तक उपयोग करना था, तब हट जाए तो पीड़ा होगी। तो कहने का मतलब है — जब तक हमारी इच्छा-अपेक्षा है और इंद्रियों द्वारा हम उसकी पूर्ति करने में सामर्थ्यवान हैं, तब तक मृत्यु का भय है। अब इच्छा-अपेक्षा तो रह गई लेकिन इंद्रियों द्वारा भोग नहीं कर पा रहा, इंद्रियां पूरी तरह कमजोर हो गईं, यही शरीर परेशान कर रहा है — तब वह मरना चाहेगा, कि अगला शरीर मिल जाए; इसमें रहकर भी क्या करेगा। और इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो गए, तो भी मौत से आप मुक्त हो गए। जैसे आपने कोई साधन अपनाया — करोड़ों की गाड़ी है — लेकिन रास्ते में फाइनल हो गया कि अब यह आगे नहीं जाएगी, तो क्या उसमें बैठे रहोगे? छोड़कर चले जाओगे। साधन में तभी रहना चाहूंगा जब वह या तो भोग में काम आए या योग में; मेरे उपयोग के ऊपर है कि मैं किस में लगा हूं। जवान लोग जो आत्महत्या कर लेते हैं, उसके पीछे भी गहरी इच्छा होती है — कोई कामना पूरी नहीं हो पाई जो वे पूरी करना चाहते थे। पागल को कभी आत्महत्या करते नहीं देखोगे — कचरा बीनकर खाता रहता है, कहीं भी सोया रहता है, लेकिन आत्महत्या नहीं करता। तो इस पिंड से पीछा छुड़ाने का तरीका है इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो जाओ — यही तप है। कैसे भी अपने आप को इच्छा-अपेक्षा से, कामनाओं से मुक्त करा लो।

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वीडियो: जीवन क्या है ? #योगी · 2025-10-07