प्रश्नोत्तर P16-0156 · भाग 16
प्रकृति से हमें जो मिल रहा है, हम उसमें, उस व्यवस्था में जी रहे हैं — तो हमें क्या करना चाहिए?
आप सदुपयोग करो। आप कुछ नहीं कर सकते, बस दुरुपयोग करना छोड़ दो। आपको लग रहा है कि इस पेड़ को मैं सींच रहा हूं — जंगलों में, पहाड़ों में, पत्थरों में कई-कई साल से पेड़ खड़े हैं, गर्मी में उन्हें कौन पानी देता है? बस आप काटना बंद कर दो, आपको लगाने की जरूरत नहीं — प्रकृति उतना खुद पैदा करती है, उसे आपके सहयोग की जरूरत नहीं। प्रकृति पर कृपा मत करो, बस इतनी कृपा करो कि काटना बंद कर दो; प्रकृति सामर्थ्यवान है। आप पेड़ लगाते हो तो अपने लिए — उसकी छाया लेने के लिए, उपयोग करने के लिए; ठीक है, उपयोग करो, लेकिन यह मत कहो कि मैंने प्रकृति का सहयोग किया — आप प्रकृति का कभी सहयोग नहीं कर सकते, बस उपयोग कर सकते हो। यह शरीर परमात्मा से मिलने के लिए मिला है। आप बेईमानी करके फंस गए; अगर बेईमानी नहीं करते तो आपको किसी साधना की आवश्यकता नहीं थी — आखिर में शरीर छूटने के बाद परमात्मा के पास पहुंचते, क्योंकि ईमानदारी, सत्य तो अंदर है ही। कुछ करने की जरूरत नहीं थी, सिर्फ जीना था, और जीने में उससे मिलना हो जाता। तुमने जिया ही नहीं — तुम्हें कामनाओं ने, वासनाओं ने, सम्मान ने, बड़ा बनने ने, देव प्रवृत्ति ने, राक्षस प्रवृत्ति ने चलाया; तुम कब जिए? मान का चक्कर, स्वाद का चक्कर, अपने तरीके का चक्कर, कुछ बनने का चक्कर — इन चक्करों ने ऐसा डाला कि घनचक्कर हो गए हो; बस आगे बढ़ो, और कमाओ, और आगे बढ़ो — बाकी सब भूल गए।
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वीडियो: पांच तत्वों का हमारे जीवन में महत्व / #पांच #तत्व #aadhyatmik #satsang · 2024-09-06