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प्रश्नोत्तर P17-0009 · भाग 17

योगी जी, मैं जो आपको देख रही हूं, सुन रही हूं, बोल रही हूं — इसे जीवात्मा समझूं — तो इस जीवात्मा को आखिर चाहिए क्या? जो चाहिए-चाहिए था वो देकर भी देखा, पर संतुष्टि नहीं, कहीं "द एंड पॉइंट" आता ही नहीं। मेरा हाल खुजली वाले रोगी जैसा है — खुजाने में मजा भी, फिर जलन भी। मंजिल दूर हो तो उसके पीछे भागती हूं, पास पहुंचते ही वो फीकी हो जाती है, और उसके चक्कर में कितने पाप कमाए, कितनों का दिल तोड़ा। अब थक गई हूं — बताइए मुझे क्या चाहिए, कहां पहुंचना है कि उसके बाद कोई दूसरा ऑप्शन न दिखे और परम शांति मिले?

आकर्षण तभी होता है जब आपको चाहिए। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है — जब उसमें उसके तत्व होते हैं; और अगर लोहे की मात्रा ज्यादा है, चुंबक की कम, तो लोहा चुंबक को खींच लेगा। रूप, गंध, स्पर्श — हम आकर्षित तभी होते हैं जब हमें चाहिए, और जितनी मात्रा ज्यादा उतना आकर्षण। रास्ते में ₹1 गिरा हो तो जाने दो, दो लाख हों तो उठाओगे; लेकिन वही एक लाख ना चलने वाले नोट हों तो नहीं उठाओगे, क्योंकि उसका मूल्य नहीं है। आकर्षण उसी से होता है जो आपकी जरूरत को पूरी करे। तो आकर्षण "चाहिए" में है। अब अगर देखोगे तो आपको चाहिए शांति। कभी लोगों ने, कपड़ों ने, जरूरत की चीजों ने भी शांति दी — लेकिन तब तक, जब तक मैंने अपने आप को शरीर समझा था। कहीं से समझ में आया कि मैं शरीर नहीं हूं, शरीर का तो एक दिन नाश हो जाएगा, तो मेरा क्या होगा? जब ये प्रश्न उठने लगे तो आप अपने आप को शरीर से अलग देख पा रहे हो। अब जिन वस्तुओं और लोगों से शांति मिलती थी, वही अशांति का कारण बन बैठे। करना कुछ और था, कर बैठे कुछ और। क्योंकि आत्मा को चाहिए परमात्मा, जीव को चाहिए प्रपंच। जैसे कैदी पैदा होते हुए कैदी नहीं होता — उसने खुद अपराध करके अपने आप को कैदी बनाया — वैसे ही आत्मा ने खुद अपने आप को जीवात्मा बनाया। हम इस संसार को जानना चाहे, और इस संसार को कोई कभी जान नहीं सकता, क्योंकि जिसे आप जानने का प्रयास कर रहे हो वो प्रतिपल बदल रहा है। जानने का प्रयास मतलब इच्छा जगी — अपूर्णता के लिए; अब जानने की आदत हो गई। तो जानने की इच्छा ही जीवात्मा हो गई। एक तरफ जानने वाला, और उसके पीछे आत्मा है जो परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल है — तुम दोनों एक ही हो। जानते-जानते लोगों को अपना बना लिया; अब आप जाना चाह रहे हो तो वो लोग खींच रहे हैं — जिनको आपने यूज़ किया है वो मानसिक रूप से खींच रहे हैं, "तुम तो चले जाओगे, मेरा क्या होगा?" जैसे कैदी फिर व्यक्ति बनना चाहता है लेकिन कानून कहता है सजा काट लो फिर जाना — वैसे ही ये कह रहे हैं, तुम मेरी भरपाई कर दो। जब हिसाब-किताब पूरी तरह हो जाएगा और आप छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हो, तो एक समय ऐसा आएगा ये आपको छोड़ देंगे। अगर उस जगह रह के भरपाई करते तो अनेक तरह के बंधन और तैयार हो जाते; तो आप अपने आप को उस जगह रख लो जहां ईमानदारी, सत्कर्म आपके द्वारा हो रहा है, और वो अपनी जिंदगी जीने लगें — प्रकृति अपने हिसाब से हिसाब कर लेगी, क्योंकि आपने समर्पण कर दिया। अब जीव को चाहिए प्रपंच — तो इसे प्रपंच मत दो। प्रपंच मतलब बेमतलब की, रस भरी बातें, जिसका जीवन में कोई सार नहीं — वो रूप, वो गंध, वो स्पर्श, वो रस। बस जरूरत में जीना चालू करो।

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वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11