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प्रश्नोत्तर P17-0017 · भाग 17

भक्ति मार्ग हो या ज्ञान मार्ग, मैंने अपनी लाइफ में भी देखा है कि लोग रिश्तों वाली आसक्ति उठाकर किसी "गुरु" पर शिफ्ट कर देते हैं, और जिसे गुरु समझा वो उस स्थिति में था ही नहीं — इससे कई जिंदगियों से खिलवाड़ हुआ, जीवन और बखेड़ा हो गया। तो विवेक कैसे रखें कि मैं वहां न फंस जाऊं, कि वो अपनी कामना के लिए मुझे मोहरा तो नहीं बना रहा — गुरु को कैसे पहचानें?

देखना ये है कि जब हम किसी शरीरधारी गुरु के पास गए — गुरु ज्ञान का प्रतीक है, लेकिन ज्ञान किसी शरीर के द्वारा ही निकलेगा — तो वो मुझसे बातचीत क्या कर रहा है। क्या कामनाओं की बात करता है, कि कामनाओं से मुक्त होने की बात करता है? बस कामनाओं की बात करता है, तो वो बना हुआ गुरु है, गुरु तो है नहीं। और कामनाओं से मुक्त होने के लिए हर पल बात कर रहा है, तो वह गुरु स्थिति में है। इस दुनिया में सबकी अपनी मर्यादाएं हैं — भाई भाई की तरह बात करता है, बाप बाप की तरह, दोस्त दोस्त की तरह; ऐसे ही गुरु गुरु की तरह बात करेगा। बहुत ध्यान से, बारीकी से इसी लाइन को समझ लोगे तो आप गुरु को पहचान लोगे: आपके पास जो है — धन, वैभव, जो भी — अगर उसको लेने की बात करे, उसकी सफाई की बात करे, तो बना हुआ गुरु है। और आपकी सफाई की बात हर वक्त, हर पल करता है — कहीं से बात की शुरुआत करो, लेकिन घुमा-फिरा के आपको आप पे ला के छोड़ देता है कि आप अपना कल्याण कर लो — तो वो परम गुरु है। इसी सूत्र से आप गुरु पहचान सकते हैं।

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