प्रश्नोत्तर P17-0022 · भाग 17
आपने बताया कि कुटिया से पहले लोग आपको लाखों देना चाहते थे पर आपने नहीं लिया। मैंने तो पैसे को इतनी वैल्यू दी क्योंकि वो शरीर को सुख-सुविधा देता है और मेरा मान बढ़ाता है — पेट भर जाए तो बचे में मान खड़ा कर लूं। और आप 15-16 साल की उम्र में घर से निकले, एक कपड़े में फक्कड़ संन्यासी की तरह रहे, आपका कोई गुरु भी नहीं रहा। तो मैं ये बात अपने स्वभाव में लाना चाहूं तो शुरुआत कैसे करूं — क्या मैं भी सब कुछ छोड़ के एक कपड़े में रहूं?
मैं जब समझने लायक हुआ और समझ बढ़ती गई, तो मैंने देखा कि पैसे को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? इससे व्यवस्थाएं मिलती हैं। व्यवस्थाएं किसे चाहिए? इस शरीर की जरूरत है। और इससे मान मिलता है — तो किससे मान की इच्छा रखें? ये तो खुद मान चाहता है, खुद दौड़ रहा है। तो मैंने देखा कि वैल्यू ना पैसे की है, ना व्यवस्था की है — वैल्यू मेरी जरूरत की है। अगर हमारी जरूरत ना हो तो ये सब पड़ा का पड़ा रह जाएगा। अब मेरी जरूरत क्या है? क्या ये उसे पूरा कर सकता है? नहीं — ये शरीर तक की जरूरत पूरी कर सकता है। मेरी जरूरत कुछ और है — भगवान, परमात्मा; और पता चला वो तब मिलेगा जब आत्मज्ञान होगा, तो मैंने आत्मज्ञान को महत्व दे दिया। अब पैसे को वैल्यू तो दे चुका था, शरीर की जरूरत भी है — तो मैंने कहा, तू एक काम कर, अपनी जरूरतें कम कर, जितने में तू जी सकता है। कम करते-करते मैं एक कपड़े पे आ गया, बिना बिस्तर का भी; भोजन मिले या ना मिले। तो पैसे से, व्यवस्था से आसक्ति हट गई और पूरी वैल्यू आत्मज्ञान को दे दी। जितने में शरीर चल जाए उतनी व्यवस्था कर ही लेता था; मुझे आज का भोजन चाहिए, कल की व्यवस्था कभी नहीं की, क्योंकि कल मैं रहूंगा कि नहीं; और इतनी समझ थी कि कल रहूंगा तो मिलेगा। तो मैंने समझ-समझ के अपने आप को निकाला — हर स्टेप पे अपनी ही धारणाएं तोड़ते रहे: आखिर ये क्यों? पहले समझा, बाद में तोड़ा; जरूरत में जीना चालू किया। और अगर मैं किसी व्यक्ति के चक्कर में पड़ा हूं, तो सीधा उसको नहीं छोड़ना था — मैं देखता था कि इसके पास कुछ है और मुझे चाहिए, तो मुझे क्यों चाहिए? उस व्यक्ति को छोड़ने के लिए कभी काम नहीं किया। देखा कि मैंने लालच में लोगों को पकड़ा था, तो लालच को पैदा ही नहीं होने दिया — पैदा हो, मार दो। चाहे जितना समय लगे; मुझे जल्दी भी नहीं थी, मैं सूझबूझ के साथ चलता था। फिर जब निकल गया तो सोचा, बहुत लोगों ने भोजन, कपड़े, रहने से, मान-अपमान से मेरी सहायता की है, तो अब जो निकलना चाह रहे हैं, उनके लिए काम करूंगा — धन सेवा, भोजन सेवा करने वाले बहुत हैं, कहानियां सुनाने वाले बहुत हैं, ज्ञान सेवा करने वाले बहुत कम। जो गड्ढे से निकल गया, वो तुम्हारे लिए गड्ढे में नहीं कूदेगा, लेकिन ज्ञान की रस्सी फेंकेगा — वो रस्सी इतनी मजबूत है; पर रस्सी तुम्हें पकड़नी पड़ेगी। रस्सी पकड़ना मतलब उसके शब्दों में चलना; बस बातें ही कीं तो खींचे किसको?
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वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11