प्रश्नोत्तर P17-0148 · भाग 17
गुरु जी, हम कहते हैं कि हमने समाज के लिए बहुत कुछ किया — तो यह समाज कौन है, कौन किसके लिए कर रहा है?
वो भी कह रहा है मैंने समाज के लिए किया, मैं भी कह रही हूं — मिलकर ही समाज बनता है। पर कर कौन किसके लिए रहा है? यहां कोई किसी के लिए नहीं कर रहा, सब अपने लिए कर रहे हैं; मां-पिता भी मोह के वशीभूत होकर करते हैं। एक गुरु है जो बस आपके लिए करता है, क्योंकि वह करने से मुक्त हो गया, उसका किसी से मोह नहीं — इसीलिए उसे परमात्मा का सीधा स्वरूप कहा गया। "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु… गुरु साक्षात परब्रह्म" — कोई शरीर गुरु पद पर आ गया, मालिकपन और दो के भाव से, बड़े-छोटे से मुक्त हो गया, तो उसे प्रणाम है। जब तक आप उस स्थिति में नहीं आते, आप भी अपने लिए ही करते रहोगे; इतनी ईमानदारी तो हो कि कह सकें "आज तक मैंने अपने ही मजे लिए और उसी मजे में फंस गया"। आत्मज्ञान होने पर कर्ता भाव से मुक्त हो जाओगे, बात खत्म।
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वीडियो: मूल से मेरा हटना कैसे हुआ ? रविवार प्रश्नोत्तरी #योगी · 2025-12-21