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प्रश्नोत्तर P18-0001 · भाग 18

गुरु जी, हमने सात्विकता, सदाचार और संस्कृति कभी नहीं छोड़ी — शायद इसी कारण हमें आपकी ओर खिंचाव हुआ, जैसे चुंबक लोहे को खींचता है। ऐसा क्यों होता है?

प्रकृति कल्पवृक्ष की तरह है — जो आपको चाहिए, जिस लायक आप हैं और जैसा भाव बनाते हैं, वह धीरे-धीरे आपकी ओर खिंचने लगता है, और जैसे ही आप उपयोग करने लायक होते हैं, आपको मिल जाता है। जैसा जीवन आप जीते हैं, वैसे ही लोग आपको मिलने लगते हैं। तीन तरह का जीवन है — सात्विक, राजसी, तामसी। आप चाहे सात्विक काम करें, राजसी करें या तामसी, खोजने की जरूरत नहीं — वैसे ही लोग आपकी ओर आकर्षित होंगे, पास आएंगे और सहयोग भी करने लगेंगे। मैंने 12 साल से ऊपर भ्रमण में देखा कि लोगों ने व्यवस्थाओं को ही लक्ष्य बना लिया — घर, गाड़ी को लक्ष्य बना लिया, जबकि ये उपयोग करने के लिए मिले थे। यह शरीर भी उपयोग के लिए मिला है; यह साधन है उस साध्य तक पहुंचने का। आज सब कुछ होता जा रहा है, लेकिन मैं अपने आप से वंचित हूं।

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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25