प्रश्नोत्तर P18-0015 · भाग 18
गुरु जी, केदारनाथ की पैदल यात्रा में डर और दर्द के बीच आपने क्या समझा?
पांव अखंड ज्योति संभालते-संभालते सड़ गए थे, चलना कठिन था, पर संकल्प था कि दवा नहीं लगाऊंगा। कुछ लड़कों ने साथ चलने का आश्वासन दिया पर आगे चले गए, और मैं रात में अंधेरे जंगल में फंस गया जहां शेर-भालू घूमते हैं। एक आदमी ने अपने गांव में रुकने को कहा, पर मैंने सोचा — आज रुक गया तो डर मुझ पर हावी होकर मुझे हरा देगा, मुझे इस हार से निकलना है; मरना तो है ही। मैं पैदल चल दिया, और मैंने अनुभव किया कि मौत के सामने पैर का दर्द कम हो गया, चाल तेज हो गई, आंसू भी चले गए। बाद में मैं उस लड़के के पास गया और कहा — जिंदगी में कभी किसी के साथ ऐसा मत करना; आज मुझे कुछ हो जाता तो जिम्मेदार कौन होता, मैं तुम्हारे भरोसे चल दिया था। भरोसा देना तो उस भरोसे को पूरा करना, नहीं तो भरोसा देना मत।
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