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प्रश्नोत्तर P18-0021 · भाग 18

गुरु जी, वह इतना दयावान है, फिर भी मेरी व्याकुलता घट जाती है और मैं किसी में लिप्त हो जाता हूं — माया बड़ी प्रबल है, उठाकर फेंक देती है। ऐसा क्यों?

किसकी माया? प्रभु की माया नहीं, मेरी माया। इस संसार में हमने एक संसार का निर्माण किया है और उसमें फंसे हैं — मैं अपने बनाए जाल में फंसा हूं; मैंने माया का निर्माण किया और उसी में फंसा हूं, प्रभु की माया में नहीं। प्रभु की माया में तो महात्मा भी जीकर गए — उन्होंने भी लोगों से भोजन, कपड़ा लिया, साधनों का उपयोग किया, राज भी चलाया।

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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25