प्रश्नोत्तर P18-0171 · भाग 18
गुरु जी, चित्त कभी राग में जाता है कभी द्वेष में, और मन बिना हमारे चाहे रेंडम कहीं भी घूमता है, ऑटोमेटिक विचार आते हैं — इसे कैसे संभालें? क्या विचारों को रोकना है?
राग और द्वेष में जाने वाले दो नहीं हैं — आप ही हो दोनों जगह; जहां अच्छा लगता है वहां राग, जहां बुरा लगता है वहां द्वेष। मन अपने आप नहीं जाता, आप ही ले जा रहे हो — शरीर का कोई अंग अपने आप नहीं हिलता; बाल हिल रहा है तो हवा हिला रही है। आप मन को शरीर की जरूरत बता रहे हो, वैसे वह स्थिर है। ऑटोमेटिक विचार भी बिना आधार के नहीं आते — आपने पहले से संचय किया है (शब्द, दृश्य, गंध, स्वाद, स्पर्श से), उसी आधार पर कल्पना बनती है; पत्ता न हो तो पत्ते से कुछ बना ही नहीं सकते। विचारों को रोकना नहीं है — आने दीजिए; बस देख लो किन विचारों में जा रहे हो और क्यों — उसके पीछे राग है कि द्वेष। विचारों से तकलीफ नहीं, उन विचारों से तकलीफ है जो अशांत करते हैं। अच्छे पल याद करना चाहते हो, बुरे अपने आप आते हैं — क्योंकि उन्हें रोका, और रोकने वाला ज्यादा आता है। इसलिए उनका सामना करो, उपयोग करो। जो करना है वो करो, मन को जहां जाना है जाने दो — देखते रहो और सही तरीके से करते रहो; कोई गिर गया तो सिर्फ देखना नहीं, उठाना है।
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वीडियो: जब मैं छोटे दायरे को तोड़ा ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-12-22