प्रश्नोत्तर P18-0180 · भाग 18
गुरु जी, आत्मा का स्वाभाविक गुण लेने का है या देने का? अध्यात्म से जुड़ने से पहले लेने की भावना ज्यादा थी, जुड़ने के बाद देने की भावना क्यों आने लगती है?
आत्मा का गुण ना लेने का है ना देने का — आत्मा सारे गुणों से रहित है, लेनदेन से परे है। देने वाले दो तरह के होते हैं — एक देकर ज्यादा पाना चाहते हैं (लाखों देकर करोड़ों चाहिए), ऐसे कामनाओं वालों को राजसी या तामसी गुरु मिलते हैं; सात्विक गुरु ना कुछ देता है ना लेता है, वह बताता है कि लेनदेन से कैसे मुक्त हो जाओ। अध्यात्म की तरफ बढ़ते हो तो अपेक्षा में नहीं देते, बस कर देते हो, क्योंकि आप निर्विकार होना चाहते हो। जो आपके पास है — धन, तन, ज्ञान — उसे सत्कर्म में लगाकर अब आप उसे बढ़ाना नहीं, खत्म करना चाहते हो; बनाए हुए अस्तित्व को मिटाना चाहते हो। देते हुए भी आप कुछ दे नहीं रहे, खाली कर रहे हो, क्योंकि उस देने के पीछे कुछ नहीं चाहिए — आप अपने मूल पर आना चाहते हो जहां ना लेन था ना देन।
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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29