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प्रश्नोत्तर P2-0180 · भाग 2

योगी जी, आपने जो लक्ष्य बनाया, उस पर इतने अटूट निश्चय से चले; सामने भोजन और पेट में भूख होते हुए भी आपका स्वाभिमान ऐसा कि कभी गिड़गिड़ाए नहीं। आपने इतने कष्ट झेलकर हम जिज्ञासुओं के लिए जगह, भोजन, ज्ञान — सब उपलब्ध कर दिया। फिर हममें वह लगन, वह तड़प क्यों नहीं है? आपकी लगन और भाव क्या रहा होगा?

एक बार मैं (मलाड) आश्रम गया था; वहां चार दिन कुछ नहीं खाया, पानी भी नहीं पिया। वहां गुरु जी भी थे, फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा; मैं रोता हुआ आश्रम छोड़कर चला गया। एक तड़प थी कि जीवन अज्ञान में न जाए। अफसोस, पछतावा कभी नहीं हुआ, क्योंकि सारी जिम्मेदारी मेरी थी। मैंने कहा ना, एक व्यक्ति भी मुझे इस मार्ग पर नहीं लाया — तो किससे कहूं? मैं जाऊं तो कोई रोकने वाला ही नहीं; वे तो जाने का ही इंतजार कर रहे थे। किसी से तब कहोगे जब कोई आपकी भावनाओं को समझने वाला हो; नाराज तब होगे जब कोई प्रेम करने वाला, मनाने वाला हो। कोई है ही नहीं, तो नाराज होकर मर भी जाओ, कौन पूछेगा? इस मार्ग पर लाने वाला, इसकी व्यवस्था करने वाला — जगह, भोजन, साधना की वस्तुएं, कहीं जाना — सब मुझे ही करना था; मर भी जाओ, तो पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी। लगभग 12-13 साल में ऐसी कई घटनाएं घटीं। एक बड़ी भयानक थी: मुंबई से फ्लाइट से गुवाहाटी गया, वहां कामाख्या में काम किया, फिर गुवाहाटी से चेन्नई की फ्लाइट पकड़ी। उतरा तो मेरे पास बहुत थोड़े रुपये थे। पैदल एयरपोर्ट से स्टेशन गया, फोन किया; उस समय फोन से पैसे भेजने की व्यवस्था बहुत कम थी, और अगले दिन रविवार पड़ गया। मैं तिरुपति बालाजी जा रहा था, वहां लोग हिंदी भी कम जानते थे। स्टेशन पर खड़ा था, एक व्यक्ति ने खाने के लिए ₹20 मांगे; जेब देखते हुए भी मैंने दे दिए। बाद में किसी ने कहा कि ये लोग बेवकूफ बनाते हैं — मैंने कहा, कोई बात नहीं, खाने के लिए ही तो मांगा। फिर बिना टिकट ट्रेन में बैठ गया; सामने लोग वड़ा-पाव, समोसा खाते रहे, भूख थी, आंखें देख रही थीं, नींद भी नहीं आ रही थी। स्टेशन से मंदिर 20 किलोमीटर से ऊपर था, पैदल चला। गणपति का समय था, एक जगह प्रसाद बंट रहा था; मांग तो सकते नहीं थे, पर प्रसाद तो खा सकते हैं — लाइन में लगा, मेरा नंबर आया तो उसने हटा दिया। एक व्यक्ति ने अपना प्रसाद मुझे दे दिया और उसे खूब डांटकर बिना प्रसाद लिए चला गया। वह प्रसाद खाकर, पानी पीते-पीते मंदिर तक गया, रात बिताई, दूसरे दिन पैसे आए तब कुछ खाया-पिया। ऐसे कई दिन-रात गए हैं; भूख क्या होती है, बिना बिस्तर कहीं भी सो जाना — बहुत समय ऐसे गया। मैं सारी व्यवस्था कर सकता था, लेकिन उसमें लगता तो यहां तक नहीं पहुंचता, प्रत्यक्ष ज्ञान की खोज नहीं कर पाता; उसी में डूब जाता, ताकत उसी में लग जाती। ऐसी घटनाएं याद करूं तो अभी भी आंसू निकलने लगते हैं। लेकिन मैं कभी विचलित नहीं हुआ, कभी पीछे नहीं मुड़ा, कभी किसी को दोषी या जिम्मेदार नहीं ठहराया; बस लगा रहा कि एक समय ऐसा आएगा, मैं जिसके लिए निकला हूं वह हो जाएगा। विश्वास भी मेरे लिए छोटी चीज है — मुझे पता था कि हो जाएगा, क्योंकि मैं पूरी तरह लगा था, सब कुछ उसी के लिए लगा दिया था। गुरु ने भी कह दिया — जो तुझे चाहिए, मैं नहीं दे सकता, जा खोज; उन्होंने पल्ला झाड़ लिया। जो लावारिस हो गया, जिसे सबने छोड़ दिया, वह किससे कहे? उसकी नाराजगी खत्म; व्यक्ति रूठता तब है जब मनाने वाले हों। और पीछे जाना नहीं था — मैंने फाइनल कर लिया था कि यह (पुराना) जीवन मुझे नहीं चाहिए। यह मेरा पहला और आखिरी रास्ता है: या तो खोज लूंगा, या खोज में मर जाऊंगा। मेरे पास और कोई विकल्प ही नहीं था, कोई अपने थे ही नहीं जिनके लिए एक बार मुड़कर देखूं।

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वीडियो: मेरे भाव को तू योगी ही समझ सकता है । #योगी · 2026-01-20