प्रश्नोत्तर P2-0198 · भाग 2
महानगरों में रहने वाले लोग, जो आपसे जुड़े हैं, अब समझ रहे हैं कि नौकरी में ईमानदार तो रहे, पर सत्कर्म नहीं किया — मुंह लक्ष्य की ओर रहा, पर कदम नहीं बढ़े। पर महानगरों में पक्षियों-चींटियों को दाना डालने की जगह या सच्चे जरूरतमंद ढूंढना मुश्किल है; भिखारी भी ₹1 दो तो ऐसे देखते हैं जैसे अपमान कर दिया। वहां हम क्या सत्कर्म कर सकते हैं?
जैसे देख लीजिए — अभी आप यह वीडियो देख रहे हैं; यहां भी इतना काम मैं कर रहा हूं — वृक्षारोपण किया, एक दिन से लेकर आजीवन तक साधकों के लिए व्यवस्था कर रहा हूं — तो इसमें सहयोग देना भी सत्कर्म है। सत्कर्म आप बहुत आसानी से कर सकते हो, जब देख पाओगे। कितने लोगों के फोन आते हैं — इतने महीनों से मेरे ज्ञान का लाभ ले रहे हैं, जीवन बदल गया; कहो कि कुछ सहयोग किया? — ‘यह तो हमने सोचा ही नहीं।’ कोई कहता है — आप बहुत अच्छा बोलते हो, बहुत अच्छा काम किया; तो क्या तुम ताली बजाने के लिए पैदा हुए हो? यह कहकर वे अपने अहंकार को पोषण देते हैं। ऐसे खोखले ईमानदार, कंजूस ईमानदार बहुत हैं, और वहीं सड़ जाते हैं; उनका धन भी वहीं रह जाता है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — मैंने जीवन में ज्ञान कमाया, आपने पैसा कमाया; दोनों मिल जाएं तो बहुत लोगों का कल्याण हो जाए, और उससे आपका भी उद्धार हो जाए — इस ज्ञान को फैलाने में अपना कमाया धन लगाते, तो आपका कल्याण हो जाता। लेकिन आप पूरा माल अपने घर-परिवार को देकर आ गए और कहते हो कि अब मेरा कल्याण कैसे होगा — कभी नहीं होगा। यह चालाकी काम नहीं आने वाली। अपने पुरुषार्थ का क्या समाज के हित में खर्च किया, वह बताओ। हम बड़े चालाक हैं — सारा माल रखकर आ जाते हैं, ‘हुआ तो हुआ, नहीं तो वापस चले जाएंगे’; और अपनी शातिरता को जिम्मेदारी, कर्तव्य कहते हैं।
तीन सेवाएं होती हैं — धन सेवा, तन सेवा, ज्ञान सेवा। 25-26 साल में निकलो, तो तन सेवा भी दे सकते हो; पूरी शक्ति उसी समय होती है। 60 के बाद तन सेवा नहीं हो सकती — उस उम्र में व्यक्ति को खुद सेवा चाहिए; जैसे जंगल में फंसे हो तो कोई भी नई गाड़ी का उपयोग करेगा, डगमगाते इंजन वाली पुरानी का नहीं। 60 के बाद कह रहे हो — मेरे पास तन है, मेरी समझ ले लो, बुढ़ापा मेरा ले लो, ज्ञान मुझे दे दो; तुम्हारा तन, तुम्हारी समझ तो तुम्हारे घर वालों के काम नहीं आ रहे। (60 के बाद) समझ तभी समाज के काम की है, जब आत्मज्ञान हो गया हो; किताबों की जानकारी तो सबके पास है। तो 60 के बाद आदमी के पास धन (सेवा) ही हो सकती है — और वह तो सब परिवार को दे आए। बुढ़ापा कोई क्यों लेगा? तुम्हें भी नहीं चाहिए — हर व्यक्ति सफेद बालों को काला करके जवानी रोकना चाह रहा है। हां, अगर कहते कि पुरुषार्थ मैंने किया, उसका आधा परिवार को दिया, आधा यहां लाया हूं, मुझे कल्याण के अलावा कुछ नहीं चाहिए — तब कुछ होगा। अपनी जिम्मेदारी, कर्तव्य निभाते हुए पुरुषार्थ का कमाया धन सत्कर्म में लगाओ। तीन में से एक भी दोगे — धन, तन या अपनी समझ — तो आपका कल्याण वहीं से शुरू हो जाएगा।
आप तुलना करते हो कि यह (गुरु जी) तो पहुंच गया — पर कैसे पहुंचा? इस व्यक्ति ने शुरू से आज तक सब समाज को दे दिया। और तुमने सब सुरक्षित रखा, और अपनी घुटन लेकर निकल गए कि कोई ले ले। जहां से लाभ ले रहे हो, वहां सहयोग नहीं दे रहे — ‘मैं उस लायक हूं ही नहीं’ कहकर आसानी से निकल जाते हैं। सीधी बात है — अगर उपयोग करने लायक हो, तो उसका मूल्य चुकाने लायक भी हो; चुकाने लायक नहीं हो, तो उपयोग मत करो। मेरा तो सिद्धांत है — अगर आप किसी का उपयोग कर रहे हो, तो जिस लायक हो, उसे दो। सत्कर्म आप बहुत अच्छे तरीके से कर सकते हो, करना चाहो तो; आप बस बचना चाह रहे हो। कल्याण तब होगा जब कुछ करोगे; बातें करने से कल्याण नहीं होगा।
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वीडियो: आखिर कब तक ये याद रहेगा ? #योगी · 2026-01-16