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प्रश्नोत्तर P21-0027 · भाग 21

ऐसी सुनसान जगह में अकेले बैठना या कोई एकांत मंदिर ढूंढ लेना — खुद को जानने में यह कितना सहायक है?

जीवन में सत्संग है, किसी जीवंत गुरु का सानिध्य है, तब एकांत का कुछ मतलब होगा। मैं तो भ्रमण में यहां आया, रुका, चला गया। मान लो आप टिक भी गए, तो संसाधन की व्यवस्था कैसे करोगे? व्यवस्था करने में राग-द्वेष हो जाएगा, और व्यवस्था साथ ले आओगे तो उसमें अहंकार रहेगा — वह अशुद्ध है, उससे कुछ होगा ही नहीं। साधना कभी भी "तेरा" में होती है, "मेरा" में नहीं — तेरा मतलब परमात्मा की दुनिया; अपनी दुनिया से निकलोगे तब तेरा की दुनिया समझ में आएगी। अपनी व्यवस्था करके साधना करोगे तो अहम भाव बढ़ेगा, क्योंकि आपकी व्यवस्था दूषित है — अगर उसमें शुद्धता होती तो उसे छोड़कर भागते क्यों? शुद्ध जगह ढूंढ रहे हो, इसका मतलब जहां हो वह अशुद्ध है; अशुद्ध व्यवस्था जहां भी ले जाओगे, अशुद्ध ही रहेगी। इसीलिए कहा गया है — कोई खोजी है, जिज्ञासु है तो जीवंत गुरु ढूंढे और उसके सानिध्य में रहे; मैं भी तो जीवंत गुरु ही ढूंढ रहा था।

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वीडियो: मेरे भ्रमण की एक और जगह #योगी · 2026-01-27