प्रश्नोत्तर P21-0112 · भाग 21
गुरु जी, संसार में किसी पद पर रहते हुए कर्मचारियों से काम लेना पड़ता है, समझाना-कहना पड़ता है — इसमें राग-द्वेष बनता है और वहां से बददुआ भी आती है; इसके लिए मार्गदर्शन करें।
अपने तरीके से मत करो, काम को काम के तरीके से करो; जिस पद को लिया है, उस पद का कार्य करो। कुछ समझाना चाहो तो उस पद के दायरे को लेकर समझाओ — सीनियर हो तो सीनियर बनकर कहो कि ये आपको करना पड़ेगा, जूनियर हो और सीनियर कुछ गड़बड़ कर रहा है तो मानवता के नाते धीरे से सलाह दो, जबरदस्ती मत करो; माने या ना माने, राग-द्वेष नहीं होना चाहिए। आगे गड्ढा है, मैंने बताया, वो नहीं माना और गिर गया, अब निकालने को चिल्ला रहा है — तो मानवता कभी मत छोड़ो, उसे निकालो। समझने के लिए बोलो, समझाने के लिए नहीं; समझाना मतलब आप दबा रहे हो, टॉर्चर कर रहे हो, पद का दुरुपयोग कर रहे हो। आप किसी को समझने के लिए बोल सकते हो, समझा कभी नहीं सकते — समझने की क्षमता उसके पास है या नहीं, वो तय करेगा, तुम नहीं। पहले शिक्षक मारते थे, बच्चे डर से कह देते "सब समझ आ गया", डिप्रेशन में चले जाते — आपने उस पद का काम ईमानदारी से नहीं किया। जितने महात्मा हुए, समझे, उन्होंने अपने मां-बाप को भी जबरदस्ती नहीं समझाया; बुद्ध ने बात रखी, जिसने समझा उसका उद्धार हुआ। जैसे जानवरों में नस्ल होती है — देसी गाय को कितना भी खिलाओ, 20 लीटर दूध नहीं देगी — वैसे मनुष्यों में भी क्षमता अलग-अलग है; काश हम मानव की नस्ल समझ जाते तो राग-द्वेष नहीं होता। पत्नी से कहते हो तू मुझे समझ — उसकी यात्रा भोग की है, तेरी योग की; तुम उसका साथ दोगे तो भ्रष्ट हो जाओगे, वो तुम्हारा साथ देगी तो घुटन में चली जाएगी। सब अपनी-अपनी यात्रा कर रहे हैं — किसी को जबरदस्ती साथ लेकर मत चलो, कोई साथ आता है तो सहयोग है; नस्ल को पहचानो।
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