आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P21-0118 · भाग 21

गुरु जी, हमारा मूल स्वरूप परमानंद है और उसे ही पाने के लिए हम ये सब धारण करते हैं, लेकिन उसी से बिगड़ रहे हैं — ऐसा क्यों होता है?

चाहते तो हम वही हैं, लेकिन काम किसके लिए कर रहे हैं? परिणाम काम से आएगा, चाहने से नहीं। अगर उसके लिए काम करते तो पा जाते। जैसे दुकानदार को जिस सामान के लिए पैसा दिया वो सामान देगा — ये प्रकृति एक दुकान की तरह है, आपकी योग्यता के अनुसार यहां सब मिल रहा है। आप चाहते हो परमानंद, क्योंकि सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन काम कर रहे हो वैभव, मान, सम्मान, इज्जत बढ़ाने के लिए — तो जिसके लिए काम करोगे वही बढ़ेगा। परमानंद के लिए काम करने का मतलब है यही बेईमानी छोड़ना — मान की इच्छा, दिखावा, बड़ा-छोटा बनने की इच्छा और योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा; और इनमें मालिक एक है — योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा; इस पर काम कर दिया तो बाकी तीनों अपने आप खत्म। क्योंकि योग्यता से ज्यादा पाना है तो सामने वाले के आगे दिखावा करना पड़ेगा — उधार लेना है तो बताना पड़ेगा कि मैं बड़ा आदमी हूं, दे दूंगा। तो योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करो, जितनी योग्यता है उसमें जियो; और चाहिए तो योग्य बनो, अपने आप को योग्य बनाने के लिए काम करो।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: मुझे कहां होना है ? कलबुर्गी कर्नाटक में पुनः सत्संग 12 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-14