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प्रश्नोत्तर P22-0028 · भाग 22

गुरु जी, ब्रह्मानंद जब मिलता है तो माया सस्ती क्यों हो जाती है? जिन महापुरुषों ने ब्रह्म की मस्ती पाई, उनके लिए माया के सारे आकर्षण फीके क्यों हो जाते हैं? पहले यह समझना है कि माया क्या है।

प्रभु की माया में कोई दुख नहीं है, ना सुख है — आनंद है। हमारी माया में हमें परेशानी है। हमने भी एक माया का निर्माण किया है — हमारी माया में लोभ है; उसे हमने लालच में बनाया है, उसमें हमने बेईमानी-दुष्कर्म किया, इसलिए उसमें अशांति है। अगर हम उस माया को छोड़ के प्रभु की माया में आ जाएं तो फिर आनंद ही आनंद है। हमारी माया अस्थाई है, परिवर्तनशील है, क्षणिक सुख है। तो बेईमानी-दुष्कर्म छोड़ दो, माया से मुक्त हो जाओगे। इसी माया में, इसी संसार में महापुरुष आनंद में जिए — वे भी भोजन कर रहे थे, बस संचय नहीं करते थे। आप सात पीढ़ी के लिए बनाते हो, और उसके लिए कोई भी कर्म करने को तैयार हो जाते हो। जीवन जीने के लिए जितना जरूरी है उतने की जरूरत है; लेकिन आप संचय में परेशान हो, बड़ा बनने के चक्कर में, मान के चक्कर में, दिखावे के चक्कर में परेशान हो। महापुरुष ये छोड़ देता है — छोड़ने वाले को ही महापुरुष कहा जाता है, और आप भी उस स्थिति में आ सकते हो। मस्ती भोग-भोजन में भी है, लेकिन क्षणिक है; वही सुख बाद में दुख देता है, वही हमारे लोग बाद में हमें दुख देते हैं — जब हमारे तरीके से हुआ तो सुख, नहीं हुआ तो दुख। ब्रह्मानंद तो है ही; बस बेईमानी-दुष्कर्म छोड़ दो — इसी को साधना कहते हैं। क्यों पकड़ के रखे हो? जब तक नहीं छोड़ोगे तब तक आनंद में नहीं आओगे। जब तक इच्छा और अपेक्षा से मुक्त नहीं होगे, अपने आप में नहीं आओगे; अपने आप में नहीं आओगे तो आनंद में नहीं आओगे; आनंद में नहीं आओगे तो परमानंद में भी नहीं जा पाओगे। इच्छा-अपेक्षा में दुख-सुख है, दोनों का त्याग करना पड़ेगा — बस, माया से मुक्त हो जाओगे।

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वीडियो: माया को सस्ती क्यों कर देती है ब्रह्म की मस्ती ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-21