आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P22-0141 · भाग 22

गुरु जी, थोड़ा और समझाइए — ये पांच इंद्रियों का सब बाहरी है: खाना बन रहा है तो स्मेल आ रही है, देखने से (जैसे आम का उदाहरण), सुनने से भी मन में वैसा दिखने लगता है। मैं पहले सोच रही थी कि सब मन से हो रहा है। ये समझ में आने के बाद हमें क्या करना है?

सब बाहर से हमारे पास आता है। मैंने कहा ना — हमारे पास कुछ नहीं है; ये शरीर है, मैं हूं। मेरे पास जितना भी है, बाहर का है; मेरे पास तो बस मैं हूं, लेकिन सब मैंने ग्रहण कर लिया। अब उससे अपने आप को छुड़ाना है। जरूरत में जीना है। मैंने सब बाहर से धारण कर लिया है — राग-द्वेष में, बड़ा बनने के चक्कर में, मान के चक्कर में "मैं कुछ हूं"; इस "मैं कुछ हूं" ने मुझे गिरा दिया, लेकिन अभी भी मैं कह रहा हूं मैं कुछ हूं। तो मुझे इससे मुक्त होना पड़ेगा — मैं कुछ नहीं हूं, इसलिए मैं हूं। और मैं कुछ हूं तो इसका मतलब मैं फिर वही परिवर्तनशील में हूं।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: हमारे अंदर कितनी अच्छाई है उतनी ही बुराई है क्या ? #livesatsang #yogiji_ka_satsang · 2025-04-19