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प्रश्नोत्तर P23-0014 · भाग 23

प्रणाम गुरु जी, उपनिषद के हिसाब से अपने शरीर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य क्या है?

अपने तरीके से जो चाहिए, उसका त्याग कर — मेरे शब्द में यही उपनिषद का सार है। द्वैत कब है? जब आपको अपने तरीके से चाहिए। अद्वैत कब है? जब आपको कुछ नहीं चाहिए। बस बात खत्म, यही उपनिषद का सार है। और आवरण से मुक्त हो जाना — वेदांत का सार है। रामायण का सार है — रामचरितमानस, राम का चरित्र अपने जीवन में उतार लो। गीता का सार है — 'मेरा' और 'कर्ता' से मुक्त हो जाओ। 'मेरा' से मुक्त होने के लिए ठीक शब्द का प्रयोग करो; कर्ता से मुक्त होने के लिए अनुमान लगाना छोड़ दो। अनुमान लगाना छोड़ दिया तो कर्ता का भाव प्रकट ही नहीं होगा, बनेगा ही नहीं। बस जैसा है वैसा बता दो — प्रत्यक्ष परिणाम आने के बाद बताओ; परिणाम के पहले बोले तो फंस गए। परिणाम के पहले आप बोलते हो मान के चक्कर में, वही कर्ता का भाव आता है। ठीक शब्द का प्रयोग करो तो राग-द्वेष होगा ही नहीं। परिणाम के पहले अगर आपने बता दिया, और जैसा बताया वैसा हो गया, तो 'मैं' खड़ा हो जाएगा, आप लोगों को ढूंढोगे; और नहीं हुआ तो लोग आपको ढूंढेंगे। आप पूरा गीता पढ़िए, आपको समझ में नहीं आएगा कि 'मेरा' और कर्ता से कैसे मुक्त हों; मैं आपको सार भी बता दिया और तरीका भी बता दिया। सार पकड़ के निकल जाओ, या फिर पढ़-पढ़ के यहीं आओगे — आना तो आपको यहीं पड़ेगा। ईमानदारी, सत्कर्म, और योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा तो आपको छोड़नी ही पड़ेगी, तभी कुछ होगा, नहीं तो ऐसे ही घूमते रह जाओगे। जब तक योग्यता से ज्यादा चाहिए, ऐसे भटकते रह जाओगे। और यह आपको ही करना है — चाहे अभी करो चाहे कल, लेकिन कल-कल करते-करते काल आ जाता है।

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वीडियो: दर्शन से हमें क्या सीखना है ? #livesatsang #yogi Ji ka satsang · 2025-03-13