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प्रश्नोत्तर P23-0075 · भाग 23

गुरु जी, जरूरत से ज्यादा बनाना-रखना तो प्रगति है ना? इसे प्रगति क्यों ना कहें?

आप जरा ध्यान से समझो मेरी बात। आपके पास कितने कपड़े हैं? 15–20 कपड़े रखना प्रगति है? यह विनाश है। पहनते कितने हो? दो सेट काफी हैं — एक पहना, एक साफ करके रख दिया। साधक की थैली में दो सेट — एक तन पे और एक थैली में — उसे कहते हैं साधक। इतने बड़े-बड़े सूटकेस लेकर घूम रहे हो — अंदर भी खूब भर लिए हो और बाहर भी, घसीटते हुए ला रहे हो। महिलाओं के पास 100 साड़ियां हैं तो भी कम हैं, और पहनती एक-दो हैं; जितने गहने बनाने में आप परेशान हुए, जितनी बेईमानी की, वे गहने एकाध-दो बार शादी-विवाह में पहने जाते हैं, बाकी अलमारी में सड़ते हैं। अपने शौक के लिए सामने वाले गार्जियन को तुमने भ्रष्ट कर दिया — इसको उन्नति नहीं, पतन कहते हैं। घर ऐसा बना लिया कि रहने वाले दो और कमरे साफ करने के लिए नौकर रखने पड़ते हैं — बस मान के चक्कर में। पहले एक मां के पास कितने बच्चे साथ सोते थे — शरीर से भी नजदीक, मानसिक भी नजदीक; आज सबको अलग-अलग रूम चाहिए, क्योंकि सब अपने परिवार में ही राग-द्वेष में फंस गए। प्रेम है तो कम जगह में ज्यादा जगह हो जाती है, और द्वेष है तो ज्यादा जगह में भी कम जगह हो जाती है। श्रृंगार क्या है? आप चरित्रवान हो, ईमानदार हो, सत्कर्मी हो — पुरुष हो चाहे स्त्री — वही आपका श्रृंगार है। अंदर से अपने आप को भ्रष्ट कर दिया और ऊपर से श्रृंगार कर रहे हो — इसी श्रृंगार की वजह से लोग बेईमान हो गए, पतन हो गया। इसका डायरेक्ट कनेक्शन मुक्ति से है: बाहरी आवरण जरूरत में कर दो, आप मुक्ति से मोक्ष तक पहुंच जाओगे। आवरण के चक्कर में ही तो आपने बेईमानी की है। जरूरत में जीना चालू कर दो, ईमानदारी-सत्कर्म के साथ — मोक्ष के लिए, मुक्ति के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ेगा, अपने आप होगा।

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वीडियो: अभेद होते हुए भी भेद क्यों लगता है ? #livesatsang #livesatsangyogijika · 2025-03-07