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प्रश्नोत्तर P23-0077 · भाग 23

गुरु जी, आप जो रास्ता दिखा रहे हैं वह तो पहले से हमारे ग्रंथों में लिखा है — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह; अपरिग्रह का अर्थ है आवश्यकता से अधिक वस्तु का संग्रह ना करें। पहले इतने ईमानदार लोग थे — फिर हमारे देश में लोग इतने भ्रष्ट कैसे हो गए? शिक्षा में हमारी कमी रही, या हमने आवश्यकता से अधिक चाहा?

बस योग्यता से ज्यादा पाने में — साफ-साफ। और वो किसके चक्कर में? मान के चक्कर में, दिखावे के चक्कर में — उपयोग के चक्कर में नहीं। बस इतनी सी बात — इसीलिए भ्रष्टाचार। और फ्री में पाने की इच्छा — ध्यान से समझना — जब तक समाज में फ्री में पाने की इच्छा रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार चलता रहेगा। फ्री में पाने की इच्छा और मान का चक्कर जब तक जीवन में रहेगा, तब तक आप एक परेशान इंसान रहेंगे। अगर आप यह छोड़ दीजिए — मान की इच्छा, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा — तो आप शांति में जीने लगेंगे, और शांति में जीते-जीते परम आनंद घटित हो जाएगा। इतना साफ-सुथरा रास्ता है, लेकिन लोग बेईमानी-दुष्कर्म नहीं छोड़ रहे हैं और जा-जाकर खूब साधनाएं कर रहे हैं। एक शराब पीने वाला सौ रुपया कमाता था, पी के घर जाता था — उसे 2000 दे दो तो घर तक नहीं पहुंचेगा, गटर में गिरने लगेगा। पहले के गुरु नाम देने से पहले परीक्षा लेते थे कि सच में तुम्हें कुछ नहीं चाहिए; यह परीक्षा पास करता था तब जाकर देते थे। आज माइक से नाम बोल दे रहे हैं, लाखों शिष्य बना दे रहे हैं — गुरु को भी नहीं पता कि मेरे शिष्य कितने हैं। जिस गुरु का आप माला जप रहे हो, उसके दरवाजे पर चले जाओ, वह गेट के अंदर नहीं लेगा; जो जीते-जी आपको नहीं अपना रहा, वह मरने के बाद आपको क्या अपनाएगा?

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वीडियो: अभेद होते हुए भी भेद क्यों लगता है ? #livesatsang #livesatsangyogijika · 2025-03-07